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सामाजिक उत्थान का भी मार्ग किया था प्रशस्त : जियो और जीने दो – भगवान महावीर


समाज में व्याप्त विसंगतियों और नैतिक पतन ने भगवान महावीर के मन को गहराई से उद्वेलित किया। उन्होंने केवल आत्म-उत्थान ही नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक उत्थान का भी मार्ग प्रशस्त किया। व्यक्ति के चारित्रिक विकास और जीवन को श्रेष्ठ बनाने के लिए उन्होंने पाँच महाव्रत (पंचसूत्र) का प्रतिपादन किया। पढ़िए ब्र. डॉ. सविता जैन, श्री दिगंबर जैन धर्मस्थल शीतल तीर्थ का विशेष आलेख…


रतलाम। जैन धर्म की वर्तमान चौबीसी के अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर का जन्म ईसा पूर्व लगभग 540 (या 599) वर्ष पूर्व बिहार के कुंडग्राम में ज्ञातृवंश के राजा सिद्धार्थ और माता त्रिशला के यहां हुआ था। उस समय समाज में अनेक कुरीतियां, अंधविश्वास और हिंसा का व्यापक प्रभाव था। मानवीय मूल्यों, सामाजिक समरसता और नैतिक गुणों का पतन हो चुका था।

समाज सुधार की दिशा में महावीर का चिंतन

समाज में व्याप्त इन विसंगतियों और नैतिक पतन ने भगवान महावीर के मन को गहराई से उद्वेलित किया। उन्होंने केवल आत्म-उत्थान ही नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक उत्थान का भी मार्ग प्रशस्त किया। व्यक्ति के चारित्रिक विकास और जीवन को श्रेष्ठ बनाने के लिए उन्होंने पाँच महाव्रत (पंचसूत्र) का प्रतिपादन किया।

पांच महाव्रत (पंचसूत्र)

अहिंसा: किसी भी जीव को मन, वचन और कर्म से कष्ट न पहुँचाना।

सत्य: सदैव सत्य का पालन करना।

अपरिग्रह: आवश्यकता से अधिक वस्तुओं का संग्रह न करना।

अचौर्य: बिना दी गई वस्तु को ग्रहण न करना (चोरी न करना)।

ब्रह्मचर्य: पवित्रता, संयम और इंद्रियनिग्रह का पालन करना।

“जियो और जीने दो” का सार्वभौमिक संदेश

भगवान महावीर ने “जियो और जीने दो” का अमर संदेश दिया, जो एक शाश्वत सत्य है। इसे किसी भी काल, परिस्थिति या स्थान पर नकारा नहीं जा सकता। प्रत्येक जीव चाहे वह एकेंद्रिय हो या पंचेंद्रिय अपने जीवन को सुरक्षित और पूर्ण रूप से जीना चाहता है। महावीर स्वामी ने स्पष्ट किया कि जीने की इच्छा केवल मनुष्य में ही नहीं, बल्कि पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों और सूक्ष्म जीवों में भी समान रूप से विद्यमान है।

आधुनिक युग में संदेश की प्रासंगिकता

आज के भौतिकवादी युग में “जियो और जीने दो” का संदेश और भी अधिक प्रासंगिक हो गया है। यह संदेश सह-अस्तित्व और “परस्परोपग्रहो जीवानाम्” (सभी जीव एक-दूसरे के उपकारी हैं) की भावना को दर्शाता है। हमें केवल साथ रहकर विकास नहीं करना है, बल्कि एक-दूसरे के प्रति कृतज्ञता, सहयोग और संवेदनशीलता का भाव भी रखना है।

वर्तमान चुनौतियां और चेतावनी

वर्तमान समय में भौगोलिक विस्तारवाद, आर्थिक प्रतिस्पर्धा और अंधी भौतिकता ने प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन किया है। इस प्रवृत्ति ने समस्त जीव-जगत को भय और असुरक्षा की स्थिति में ला खड़ा किया है। हमें यह समझना होगा कि किसी दूसरे के विनाश पर आधारित विकास स्थायी नहीं हो सकता। ऐसा विकास अंततः मानवता के लिए ही घातक सिद्ध होता है।

निष्कर्ष

आज आवश्यकता है कि प्रत्येक व्यक्ति “जियो और जीने दो” के इस पावन संदेश को अपने जीवन में आत्मसात करे। हमें स्वयं भी भयमुक्त, संतुलित और संयमित जीवन जीना चाहिए तथा दूसरों को भी सम्मानजनक और निर्भय जीवन जीने की प्रेरणा देनी चाहिए।

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