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चातुर्मासिक धर्मसभा में प्रवचन : भक्तामर के 26वें काव्य पर दिया व्याख्यान


धर्मसभा में उपाध्याय श्री विहसंतसागर महाराज ने कहा कि जो भी जीव जन्म लेता है, उसके साथ कर्म साथ में जरूर आते हैं। ज्ञानवरण आदि आठ कर्म जीव को दुःख देते हैं और यह जीव इनको कर्मों का अभाव करके मोक्ष की प्राप्त होता है। पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट…


डबरा। आरोग्यमय वर्षायोग समिति द्वारा गणाचार्य 108 श्री विराग सागर जी मुनिराज का चित्र अनावरण एवं दीप प्रज्वलन करके बड़े ही भक्ति भाव से किया गया। मेडिटेशन गुरु उपाध्याय श्री 108 विहसंतसागर जी महाराज की सभी भक्तों ने अष्ट द्रव्य से पूजा अर्चना की, उसके पश्चात गुरुदेव ने भक्तामर स्तोत्र के छब्बीसवें काव्य में मुनिवर ने कहा कि हे महादेव! आप त्रयलोक की विपत्ति नाशक हो, महितल के विमल आभूषण हो, त्रिभूवन के स्वामी हो एवं संसार समुद्र को सुखाने वाले हो, अतः आपके लिए मेरा नमस्कार हो।

प्रातः कालीन कक्षा में मुनिवर ने बताया कि जो भी जीव जन्म लेता है, उसके साथ कर्म साथ में जरूर आते हैं। ज्ञानवरण आदि आठ कर्म जीव को दुःख देते हैं और यह जीव इनको कर्मों का अभाव करके मोक्ष की प्राप्त होता है और दोपहर कालीन स्वाध्याय में बताया कि सभी कर्मों में मोहनीय कर्म अति बलवान है। यह मोहनीय कर्म जीव को सत्तर कोडाकोडी सागर तक भ्रमाता रहता है। इसलिए यह जीव दुखी रहता है और इस कर्म के कारण जीव सभी को अपना मानता रहता है।

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