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दोहों का रहस्य -102 हर श्वास, हर कर्म, और हर भावना में ईश्वर को अनुभव करना चाहिए : शरीर और उसकी सुख-सुविधाओं पर अत्यधिक भरोसा करना मूर्खता है


दोहे भारतीय साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा हैं, जो संक्षिप्त और सटीक रूप में गहरी बातें कहने के लिए प्रसिद्ध हैं। दोहे में केवल दो पंक्तियां होती हैं, लेकिन इन पंक्तियों में निहित अर्थ और संदेश अत्यंत गहरे होते हैं। एक दोहा छोटा सा होता है, लेकिन उसमें जीवन की बड़ी-बड़ी बातें समाहित होती हैं। यह संक्षिप्तता के साथ गहरे विचारों को व्यक्त करने का एक अद्भुत तरीका है। दोहों का रहस्य कॉलम की 102वीं कड़ी में पढ़ें मंजू अजमेरा का लेख…


क्या भरोसा देह का, विनस जात छिन माह।

साँस-साँस सुमिरन करो, और यतन कुछ नाह॥


कबीरदास जी इस दोहे में जीवन के सबसे बड़े सत्य — मृत्यु और नश्वरता — का बोध कराते हैं।

‘देह’ (शरीर) का स्वभाव ही नाशवान है। यह हर पल क्षीण होता जा रहा है। चाहे हम इसे महसूस करें या न करें, हर क्षण हमारा जीवन घट रहा है — जैसे दीपक से धीरे-धीरे तेल कम होता जाता है। इस संसार में कोई भी — राजा हो या रंक, ज्ञानी हो या अज्ञानी — इस नियम से अछूता नहीं है।

कबीर कहते हैं — जब यह देह ही भरोसे के योग्य नहीं, जब यह किसी भी क्षण छूट सकती है, तो फिर संसार की व्यर्थ आकांक्षाओं, वासनाओं, भोगों और संग्रह में क्यों उलझे रहें?

“साँस-साँस सुमिरन करो” — इसका अर्थ केवल जप नहीं है, बल्कि हर श्वास, हर कर्म, और हर भावना में ईश्वर को अनुभव करना है।

हमारी सांसों की गिनती हो रही है; इसलिए हर सांस को साधना बना लो, क्योंकि कौन सी सांस अंतिम हो जाए — कोई नहीं जानता।

अतः अभी, इसी क्षण से जागो।

प्रभु को अपने प्राणों में बसा लो, अन्यथा समय किसी की प्रतीक्षा नहीं करता।

इसका सार है कि —

व्यक्ति को अपनी नश्वरता को समझते हुए जीवन में अनावश्यक अहंकार, विलासिता और लापरवाही से बचना चाहिए।

शरीर और उसकी सुख-सुविधाओं पर अत्यधिक भरोसा करना मूर्खता है।

दिखावा, प्रतिस्पर्धा, वैभव और सत्ता का मोह — ये सब अस्थायी हैं।

 

जीवन में विनम्रता, सेवा, प्रेम और सहयोग का आचरण करें।

अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए भी मन को परमात्मा में लगाएं।

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