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तिब्बत के चेंगडू में मिल गई भगवान आदिनाथ की तपस्थली..! इसरो के पूर्व अंतरिक्ष वैज्ञानिक डाॅ. राजमल जैन का दावा

 सारांश

जैन ग्रंथों में तो सदियों से लिखा हुआ है कि जैन ग्रंथों में उल्लेखित भगवान आदिनाथ की मोक्ष कहाँ हुआ था।लेकिन अब विज्ञान भी इसी दिशा में खोज कर रहा है।पढ़िए भगवान आदिनाथ की मोक्ष स्थली पर अब तक का सबसे बड़ा रिसर्च , इसरो के पूर्व वैज्ञानिक राजमल जैन के नज़रिए से…


28 साल का लंबा रिसर्च, 50 से ज्यादा 50 ज्यादा वैज्ञानिकों की टीम ने खोज निकाला है भगवान आदिनाथ की मोक्षस्थली अष्टापद…वैज्ञानिक इस निष्कर्ष पर पहुंच रहे हैं कि तिब्बत के सियाचुल क्षेत्र के चेंगडू शहर में अष्टापद हो सकता है। यह दक्षिण चीन सीमा क्षेत्र में है। उपग्रह से ली गई विशेष तस्वीरों और कैलाश मानसरोवर क्षेत्र की पड़ताल कर शुरुआती चरण में मान रहे हैं कि वो अष्टापद के बेहद नजदीक पहुंच चुके है। लेकिन अब यह स्थान फिलहाल चीन में है।

हम नतीजों में काफी करीब पहुंचें

रिसर्च टीम में शामिल राजमल जैन ने दावा किया है कि उन्होंने इस जगह को उनके भारत-चीन वैज्ञानिक मित्रों की मदद से काफी हद तक खोज निकाला है।

रिमोट सेंसिंग तकनीक की ली मदद
सेटेलाइट की रिमोट सेंसिंग तकनीक की मदद से इसकी तस्वीरें और कुछ पुख्ता प्रमाण मिले है। लेकिन तस्वीरें हाईरेज़ूलेशन की नहीं है। इसलिए पूरी तरह से दावा नहीं कर सकते कि वहीं यह जगह है लेकिन तीन बार मौके पर गई टीम के अध्ययन से भी इसके प्रमाण मिल रहे है। यह क्षेत्र चीन अधिकृत है। ऐसे में अब इसकी हकीकत जानने के लिए ग्राउंड पेनीट्रेटिंग रडार का इस्तेमाल करेंगे। जिससे भूगर्भ की तस्वीरें या स्थिति का पता लगाया जाएगा। इसके लिए इसरो की मदद लेंगे।

चीन में चल गया अष्टापद क्षेत्र

डॉ. राजमल जैन बताते है कि वर्ष 1962 में ये भाग चीन के अधिकार क्षेत्र में आ जाने से अष्टापद महातीर्थ तक जा पाना काफी मुश्किल है। लेकिन इस संबंध में भारत और चीन की सरकार के बीच वार्ता के माध्यम से महातीर्थ तक आने जाने के लिए मार्ग का निर्णय लिया जा सकता है। जैसा कि दूसरे तीर्थ स्थलों के बारे में अब तक किया गया है। इन पहाड़ों की शृंखला को मान रहे अष्टापद तिब्बत के चेंगडू में इन्हीं पर्वतमालाओं को वैज्ञानिक अष्टापद मान रहे हैं।

एक हज़ार साल पुराने जैन ग्रंथों में ज़िक्र
करीब एक हजार वर्षों पूर्व जैन मुनियों ने ग्रंथों मेंं अष्टापद महातीर्थ का उल्लेख किया है, जिसे बाद में सैंकड़ों वर्षों बाद देखा नहीं गया और उसे लुप्त हुआ मान लिया गया। जांच कर रही वैज्ञानिकों की टीम ने बताया कि जैन तीर्थंकर ऋषभदेव आदिनाथ भगवान ने सबसे ऊंचे पर्वत पर तपस्या कर मोक्ष की प्राप्ति की थी।

सिद्धक्षेत्र का रास्ता यही से…

ऐसा माना जाता है कि इस महातीर्थ स्थल के चारों ओर ऊर्जा संचयित है। इस पर तप और चिंतन करने पर आत्मा सिद्धक्षेत्र में चली जाती है। हालांकि वैज्ञानिक अभी इसे सिर्फ जैन ग्रंथों के आधार पर बता रहे हैं। इसकी भौतिक जांच के लिए इसरों की मदद ली जाएगी।वैज्ञानिकों का दावा है कि चेंगडू की पर्वत शृंखला में बना अभिषेक जल कुंड है। इसी के आसपास पौराणिक मंदिर भूगर्भ में दबा हो सकता है। जैन शास्त्रों के अनुसार श्वेतांबर आचार्य हेमचंद्राचार्य के ग्रंथ में भगवान ऋषभदेव का उल्लेख किया गया है। १००० साल पहले अष्टापद महातीर्थ देखा जा रहा था, लेकिन इसके बाद यह लुप्त हो गया।

कुछ प्रतीक चिन्हों पर मंथन
वैज्ञानिकों की टीम को कैलाश मानसरोवर के आसपास जैन धर्म के धार्मिक महत्व से जुड़े कुछ प्रतिक चिह्न भी मिले हैं। डॉ. जैन ने बताया कि अब चेंगडू में अब आगे की रिसर्च शुरू की जाएगी।

अमेरिका, यूरोपीय देश भी जुटे खोज में

कैलाश और मेरू पर्वत पर रहस्यों की खोज काे लेकर वैज्ञानिक इतिहासकार और पुरातत्वविद निरंतर खोज में जुटे हुए हैं। वहीं अब अमेरिका और यूरोपीय देश भी भगवान ऋषभदेव के मोक्ष जाने की विधि में रुचि ले रहे हैं।

अष्टापद की खोज में डॉ राजमल जैन का योगदान
वर्ष 2007 में वैज्ञानिक, भूगर्भ वैज्ञानिक, पुरातत्व विदों का दल करीब तीन बार मानसरोवर जाकर आया लेकिन उन्हें वहां भी अष्टापद महातीर्थ के संबंध में कुछ भी प्रमाण नहीं मिल पाए। इसी साल इसरो में अंतरिक्ष वैज्ञानिक रहे डॉ. जैन को जैना संगठन के अष्टापद रिसर्च इंटरनेशनल फाउंडेशन में शामिल गया गया। जहां डॉ. जैन के सुझाव पर वैज्ञानिकों की टीम सेटेलाइट की रिमोट सेंसिंग तकनीक के इस्तेमाल पर सहमत हुई। जिसके बाद तिब्बत के चेंगडू शहर में अष्टापद होने की संभावना मिली।।

ये है प्रमुख वैज्ञानिकों की टीम

इस सर्च ऑपरशेन में प्रमुख रूप से इसरो के पूर्व अंतरीक्ष वैज्ञानिक डॉ. राजमल जैन के अलावा इसरो के डॉ. पीएस ठक्कर, अहमदाबाद के एलडी इंस्टिट्यूट ऑफ इंडोलॉजी के डायरेक्टर डॉ. जितेंद्र शाह के अलावा डॉ. लता बोथरा, डॉ. नवीन जुआल भी शामिल रहे।

जनिए, अब तक क्या मिला

सर्च में स्वस्तिक और भगवान आदिनाथ के ऋषभ के चिह्न भी मिले। डाॅ. जैन ने बताया कि स्थानीय लोग सर्च में मदद नहीं करते थे। इसलिए स्विज़रलैंड की पुरातत्व विशेषज्ञ दंपती की मदद ली। लेकिन उन्होंने कैलाश मानसरोवर के 70 किमी तक अष्टापद जैसी कोई चीज नहीं होना बताया।
इसके बाद हमने अपना सर्च का तरीका बदला और स्थानीय लोगाें से घुल मिलने के लिए भाषा विशेषज्ञों की मदद ली। जिसके बाद पता चला कि जहां हम सर्च कर रहे थे उसके दूसरी ओर आठ पहाड़ों की एक श्रृंखलाहै। अब वैज्ञानिकों की टीम अब भौतिक स्तर पर चेंगडू में अष्टापद को तलाशेगी। इसके साथ ही अभिषेक कुंड को भी खोजा जाएगा।

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