मुरैना में विराजित मुनिश्री विलोक सागर जी महाराज ने रविवार को विनय का महत्व बताया। विनयवान व्यक्ति बनने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने विनयशीलता को बहुत अहम बताया। मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर…
मुरैना। दूसरों की प्रशंसा करना, उसके गुणों का बखान करना, दूसरों की खुशी को देखकर प्रसन्नचित्त होना विनयवान व्यक्ति की पहचान है। धीर वीर गंभीर व्यक्ति ही विनयवान हो सकता है। विनयशील व्यक्ति ही दूसरों के आंसुओं को पोंछ सकता है, दूसरों के दुःखों को दूर कर सकता है। किसी को दःुखी करना, परेशान करना, किसी की निन्दा करना कायरों का काम है।
यह उद्गार मुनिश्री विलोक सागर महाराज ने बड़े जैन मंदिर में धर्म सभा में व्यक्त किए । उन्होंने कहा कि जैन दर्शन में विनय को मोक्ष का द्वार कहा गया है। विनय से ही मुक्ति पाई जा सकती है। हम अपने इष्ट की भक्ति, पूजा पाठ करते हैं लेकिन, अपने अंतरंग में विनम्रता धारण नहीं करते। जितने विनम्र बनोगे, ऊपर उठोगे। जैसे जैसे आप विनम्र बनोगे, वैसे-वैसे उन्नति की ओर अग्रसर होते जाओगे। मुनिश्री ने कहा कि यदि आपने प्रभु भक्ति करते हुए भी विनम्रता का पाठ नहीं सीखा, विनय का पाठ नहीं सीखा तो बिखर जाओगे, टूट जाओगे। आज नहीं भी टूटे तो कर्म आपको तोड़ देगा। इसलिए अपने को सरल और सहज बनाने की कोशिश करें, अपनी कषायों को मंद करें, सबके प्रति विनय का भाव रखें, कभी किसी की निंदा न करें। इसी का नाम मोक्ष मार्ग है।
विनयवान व्यक्ति सर्वत्र प्रशंसनीय होता है
मुनिश्री ने विनय की महिमा का बखान करते हुए बताया कि विनयवान व्यक्ति सर्वत्र प्रशंसनीय एवं पूज्यनीय होता है। जीवन में विनय का बहुत महत्व है। जिसके जीवन में विनय नहीं है, उसका मानव जीवन बेकार है। सदैव अपने इष्ट की पूजा भक्ति करते हुए मन के विकारों को नष्ट करें और हृदय में विनम्रता धारण करें। सच्चे अर्थों में यही धर्म है।
मेरे गुरुओं का आश्रय मिले, उनका सत्संग मिले
मुनिश्री ने कहा कि अपने प्रभु की भक्ति विनम्रता के साथ करें, विनयावत होकर करें। जब भी भक्ति करें, प्रार्थना करें तो भावना भाना कि हे! भगवन मुझे धन दौलत नहीं चाहिए, हे! भगवन मुझे भौतिक सुख नहीं चाहिए। मुझे तो आप इतनी शक्ति देना कि मैं अंतिम समय तक आपकी पूजा भक्ति करता रहूं। हे! भगवन मुझे सदैव मेरे गुरुओं का आश्रय मिले, उनका सत्संग मिले। मैं कभी भी किसी के प्रति दुर्व्यवहार न करूं, मैं सदैव साधु संतों और गुणीजनों की सेवा करते हुए इस असार संसार के जन्म मरण के चक्र से मुक्त होकर आप जैसा बन जाऊं, इसी पवित्र एवं पावन भावना के साथ मै आपकी पूजन भक्ति करता हूं। आज की धर्म सभा में पंडित महेंद्रकुमार शास्त्री, नवनीत शास्त्री, प्राचार्य अनिल जैन, दर्शनलाल जैन, प्रेमचंद जैन, रवींद्र जैन, विमल जैन, नेमीचंद जैन, मुन्नी साहूला, शशि जैन, मुन्नालाल जैन सहित सैकड़ों की संख्या में साधर्मी बंधु माता बहिनें उपस्थित थीं।













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