समाचार

धर्मसभा में दिए प्रवचन : देव, शास्त्र, गुरु, धर्म कल्पवृक्ष हैं, जिनवाणी कामधेनु है- आचार्य श्री वर्धमान सागर जी


 पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमानसागर जी खांदूकालोनी, बांसवाड़ा में संघ सहित विराजित हैं। आज की धर्मसभा में मंगल देशना में बताया कि वर्तमान में कर्मभूमि का काल चल रहा है, इसके पूर्व भोगभूमि थी भोगभूमि में कल्पवृक्ष होते थे। जिनसे इच्छा करने पर वांछित सामग्री मिल जाती थी। अब कर्मभूमि में पुरुषार्थ पूर्वक कार्य कर्म करने से जरूरतें, आवश्यकताओं की पूर्ति होती है। पढ़िए राजेश पंचोलिया की विशेष रिपोर्ट…


बांसवाड़ा। पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमानसागर जी खांदूकालोनी, बांसवाड़ा में संघ सहित विराजित हैं। आज की धर्मसभा में मंगल देशना में बताया कि वर्तमान में कर्मभूमि का काल चल रहा है, इसके पूर्व भोगभूमि थी भोगभूमि में कल्पवृक्ष होते थे। जिनसे इच्छा करने पर वांछित सामग्री मिल जाती थी। अब कर्मभूमि में पुरुषार्थ पूर्वक कार्य कर्म करने से जरूरतें, आवश्यकताओं की पूर्ति होती है। वर्तमान में देव, शास्त्र, गुरु, धर्म कल्पवृक्ष हैं। यह हमें शाश्वत सुख का मार्ग बताते हैं और शाश्वत सुख प्राप्त करने के बाद कोई भी इच्छा से नहीं रहती है। वर्तमान में भोग सामग्री की जरूरत शरीर को होती है, आत्मा को भोग सामग्री की जरूरत नहीं होती है। कल्पवृक्ष और कामधेनु गाय जिनेंद्र भगवान ने हमें जिनवाणी के रूप में दिया है।

जिनवाणी में स्तोत्र मंत्र णमोकार मंत्र भक्तामर महामंत्र है, जिससे हम श्रद्धा, विश्वास, विनय, आस्था से प्रार्थना करने पर हमारे रोग दूर और इच्छाओं की पूर्ति होती है। इसलिए धर्म रूपी जड़ को मजबूत रखना जरूरी है, तभी हम रत्नत्रय धर्म श्रद्धा से 7 राजू ऊपर सिद्धालय को प्राप्त कर सकते हैं। धर्म रूपी जड़ सम्यक दर्शन, श्रद्धा है। श्रद्धा विश्वास से हमें ऊंचाई प्राप्त होती है, वर्तमान में भगवान नहीं है किंतु भगवान के गुणों की स्थापना प्रतिमाओं में पंचकल्याणक के माध्यम से सूरी मंत्र देकर की गई है।भगवान का अभिषेक विनय और सावधानी से करना चाहिए भगवान से कलश टकराने से भगवान के गुणों में कमी आती है इसलिए सम्यक दर्शन कहां और किन से मिलता है, इसकी जानकारी जरूरी है। भगवान के दर्शन मात्र से सम्यक दर्शन की प्राप्ति होती है। हर कार्य को विधि पूर्वक श्रद्धा से करने से इच्छित वस्तु मिलती है। जैन धर्म का मूल णमोकार मंत्र हैं।

बिना चारित्र संयम के हम मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकते

ब्रह्मचारी गज्जू भैय्या, समाज सेठ अमृत लाल अनुसार आचार्य श्री ने आगे बताया कि वर्तमान में अरिहंत भगवान और सिद्ध भगवान साक्षात नहीं है किंतु णमोकार मंत्र में जिनका हम गुणगान करते हैं, वह आचार्य, उपाध्याय और साधु परमेष्ठी वर्तमान में मौजूद है। हमें सभी साधुओं के प्रति श्रद्धा और विश्वास होना चाहिए। णमोकार मंत्र में आप मंगल पाठ करते हैं साधु परमेष्ठी भी सबका मंगल चाहते हैं, उपदेश देकर मंगल करते हैं। साधु सर्वश्रेष्ठ हैं क्योंकि आचार्य उपाध्याय साधु परमेष्ठि से हमें चारित्र संयम प्राप्त होता है। बिना चारित्र संयम के हम मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकते हैं। ढाई दीप में जितने भी क्षेत्र रहे, सभी जगह सिद्ध भगवान पाए जाते हैं। उनके कारण हर स्थान पावन- पवित्र हैं।

राजेश पंचोलिया और समाज प्रतिनिधि अक्षय डांगरा अनुसार आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने बताया कि आदिनाथ भगवान की स्तुति से भक्तामर पाठ की रचना हुई है। कोई सा भी स्रोत की रचना अखंड गले-गले तक भक्ति समाहित होने पर भक्ति और उत्साह से स्रोत की रचना होती है भक्तामर। राजा भोज और मानतुंग आचार्य की कहानी सभी जानते हैं। आचार्य श्री ने स्वयं की रक्षा के लिए भक्तामर की रचना नहीं की थी। उन्होंने मुनियों के सम्मान के लिए, जैन धर्म की संस्कृति के लिए भक्तामर की रचना की। इसलिए जैन स्तोत्र जिनवाणी पर हमारी अकाट्य श्रद्धा होना चाहिए। मंत्र स्तोत्र से हमारी आपदा, विपदा और रोगों से मुक्ति मिलती है। आप लोग डॉक्टर से रोगों का निदान कराते हैं उन्हें फीस देते हैं जिनेंद्र भगवान भी डॉक्टर के डॉक्टर हैं । भगवान को श्रद्धा, विश्वास भक्ति रूपी फीस से हमें मनोरथ की प्राप्ति होती है और जन्म मरण के रोग से निवारण होता है। पुण्यार्जक परिवार द्वारा भगवान की शांति धारा और आचार्य श्री को जिनवाणी भेंट कर चरण प्रक्षालन किए गए।

आप को यह कंटेंट कैसा लगा अपनी प्रतिक्रिया जरूर दे।
+1
2
+1
0
+1
0
Shreephal Jain News

About the author

Shreephal Jain News

Add Comment

Click here to post a comment

You cannot copy content of this page