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ज्ञान, साहित्य और श्रमण संस्कृति के महान संरक्षक थे डॉ. लक्ष्मीसेनजी भट्टारक : 7वें समाधि दिवस पर श्रद्धापूर्वक किया गया स्मरण


कोल्हापुर स्थित श्री लक्ष्मीसेनजी जैन मठ के मठाधीश एवं जैन दर्शन, साहित्य तथा श्रमण संस्कृति के महान संरक्षक परम पूज्य डॉ. लक्ष्मीसेनजी भट्टारक के 7वें समाधि दिवस पर श्रद्धालुओं ने उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। पढ़िए विशेष रिपोर्ट।


कोल्हापुर। श्री लक्ष्मीसेनजी जैन मठ के मठाधीश, धर्म दिवाकर सहितासूरी, जिन आगम एवं श्रमण संस्कृति के परम संरक्षक परम पूज्य डॉ. लक्ष्मीसेनजी भट्टारक के 7वें समाधि दिवस पर देशभर के श्रद्धालुओं एवं समाजजनों ने उनकी पुण्य स्मृति को श्रद्धापूर्वक नमन किया।

अल्पायु में ग्रहण किया भट्टारक पद

डॉ. लक्ष्मीसेनजी भट्टारक ने मात्र 23 वर्ष की आयु में भट्टारक पद की दीक्षा ग्रहण की थी। दीक्षा के पश्चात भी उन्होंने शिक्षा का क्रम जारी रखा और हिंदी में प्रवीणता, संस्कृत में काव्यतीर्थ तथा अर्धमागधी एवं प्राकृत में एम.ए. की उपाधियां प्राप्त कीं।

शिक्षा और ज्ञान के प्रति अद्भुत समर्पण

ज्ञानार्जन के प्रति उनकी निष्ठा का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि 75 वर्ष की आयु में उन्होंने शिवाजी विश्वविद्यालय से जैनोलॉजी विषय में पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की। डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त करने वाले वे प्रथम भट्टारक के रूप में विख्यात हुए।

जैन साहित्य आंदोलन को दी नई दिशा

सन 1984 से महाराष्ट्र जैन साहित्य परिषद के संस्थापक अध्यक्ष के रूप में उन्होंने महाराष्ट्र एवं कर्नाटक के विभिन्न क्षेत्रों में 23 जैन साहित्य सम्मेलनों का सफल आयोजन कराया। उनके नेतृत्व में जैन साहित्य एवं इतिहास के संरक्षण और प्रचार-प्रसार को नई गति मिली।

शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना में महत्वपूर्ण योगदान

श्री लक्ष्मीसेन विद्यापीठ के माध्यम से कोल्हापुर, रामबाण और बेलगांव में अनेक शैक्षणिक संस्थाओं का संचालन किया गया। उन्होंने शिक्षा को समाज निर्माण का सबसे प्रभावी माध्यम माना और जीवनभर इसके लिए कार्य किया।

ग्रंथ लेखन और प्रकाशन में उल्लेखनीय भूमिका

डॉ. लक्ष्मीसेनजी भट्टारक ने श्री लक्ष्मीसेन दिगंबर जैन ग्रंथमाला प्रकाशन संस्था के माध्यम से 12 महत्वपूर्ण ग्रंथों का लेखन एवं प्रकाशन कराया। साथ ही उन्होंने “रत्नत्रय” मासिक पत्रिका का प्रकाशन कर जैन साहित्य को समृद्ध बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

धर्मप्रभावना के लिए देश-विदेश में किया प्रवास

उन्होंने पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सवों, जिनालयों के जीर्णोद्धार, मौंजीबंधन, प्रायश्चित्त संस्कार सहित अनेक धार्मिक आयोजनों में सक्रिय भूमिका निभाई। अहिंसा, पर्यावरण संरक्षण और व्यसनमुक्ति के संदेश को जन-जन तक पहुंचाने के लिए उन्होंने भारत के साथ अमेरिका, इंग्लैंड, कनाडा और नेपाल सहित कई देशों की यात्राएं कीं।

श्रद्धा और प्रेरणा का अमिट स्रोत

तेजस्वी, ओजस्वी और शांत व्यक्तित्व के धनी डॉ. लक्ष्मीसेनजी भट्टारक ने अपना संपूर्ण जीवन धर्म, शिक्षा, समाज सेवा और संस्कृति संरक्षण को समर्पित किया। वे जैन इतिहास, साहित्य और श्रमण संस्कृति के सशक्त प्रेरणास्रोत रहे।

20 जून 2019 को हुए समाधिस्थ

परम पूज्य डॉ. लक्ष्मीसेनजी भट्टारक महास्वामी 20 जून 2019 को प्रातःकाल लगभग 78 वर्ष की आयु में समाधिस्थ हुए थे। उनके द्वारा स्थापित आदर्श, साहित्यिक योगदान और धर्मप्रभावना का कार्य आज भी समाज का मार्गदर्शन कर रहा है।

कोटिशः इच्छामि अर्पित

उनके 7वें समाधि दिवस पर श्रद्धालुओं ने उनकी पुण्य स्मृति को विनम्र नमन करते हुए कोटिशः इच्छामि अर्पित की तथा उनके बताए मार्ग पर चलने का संकल्प व्यक्त किया।

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