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संस्कारों से जुड़ते बच्चे बनें जीवन निर्माण की नींव : संस्कार किताबों में नहीं, जीवन के आचरण में होते हैं


श्री दिगंबर जैन शांतिनाथ मंदिर में बुधवार को बाल संस्कार शिविर हुआ। शिविर में बड़ी संख्या में बालक-बालिकाओं ने भाग लिया। बच्चों को धर्म, संस्कृति और जीवन मूल्यों की शिक्षा दी गई। शिविर का उद्देश्य बच्चों को नैतिकता और आत्मिक विकास से जोड़ना रहा। शिविर का मार्गदर्शन श्रेयांश शास्त्री और हर्षित जैन ने किया। अंबाह से अजय जैन की पढ़िए, यह खबर…


अंबाह। श्री दिगंबर जैन शांतिनाथ मंदिर में बुधवार को बाल संस्कार शिविर हुआ। शिविर में बड़ी संख्या में बालक-बालिकाओं ने भाग लिया। बच्चों को धर्म, संस्कृति और जीवन मूल्यों की शिक्षा दी गई। शिविर का उद्देश्य बच्चों को नैतिकता और आत्मिक विकास से जोड़ना रहा। शिविर का मार्गदर्शन श्रेयांश शास्त्री और हर्षित जैन ने किया। दोनों ने सरल भाषा में जैन धर्म के मूल सिद्धांतों अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह का महत्व समझाया। श्रेयांश शास्त्री ने कहा संस्कार किताबों में नहीं, जीवन के आचरण में होते हैं। बाल्यकाल में श्रेष्ठ विचार और धार्मिक अनुशासन मिलें, तो वही बच्चे आगे चलकर समाज की रीढ़ बनते हैं। हर्षित जैन ने आत्मा की पवित्रता और संयम पर जोर दिया।

उन्होंने कहा, आज का बालक यदि धर्म को समझ ले, तो कल वह सुशिक्षित और सुसंस्कृत नागरिक बनेगा। यही जैन धर्म की आत्मा है। सोनम अमित जैन टकसारी ने बच्चों को फल और पुरस्कार दिए। उन्होंने कहा, जैन समाज की शक्ति मंदिरों में नहीं, उन बच्चों में है जो धर्म को जीवन का आधार बनाते हैं। संस्कार ही जीवन को वृक्ष बनाते हैं। शिविर में धार्मिक कहानियाँ, प्रश्नोत्तरी, भजन, सामूहिक पाठ और गतिविधियाँ कराई गईं।

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