दोहों का रहस्य समाचार

अच्छी संगति से सद्गुण, विनम्रता और आत्मिक उन्नति होती है : बुरी संगति से पतन, अहंकार और मोह का विस्तार होता है


दोहे भारतीय साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा हैं, जो संक्षिप्त और सटीक रूप में गहरी बातें कहने के लिए प्रसिद्ध हैं। दोहे में केवल दो पंक्तियां होती हैं, लेकिन इन पंक्तियों में निहित अर्थ और संदेश अत्यंत गहरे होते हैं। एक दोहा छोटा सा होता है, लेकिन उसमें जीवन की बड़ी-बड़ी बातें समाहित होती हैं। यह संक्षिप्तता के साथ गहरे विचारों को व्यक्त करने का एक अद्भुत तरीका है। दोहों का रहस्य कॉलम की 92वीं कड़ी में पढ़ें मंजू अजमेरा का लेख…


कबीर मन पंछी भया, जहाँ मन तहां उड़ि जाइ।

जो जैसी संगति करै, सो तैसा ही फल पाइ॥


कबीरदास जी इस दोहे में मन की अस्थिर और चंचल प्रकृति की ओर संकेत करते हैं। वे कहते हैं कि मन एक पक्षी की तरह है—जो कभी भी, कहीं भी उड़ सकता है। यह प्रतीक बताता है कि मन शरीर के साथ बंधा नहीं होता; वह भूतकाल की स्मृतियों, भविष्य की चिंताओं, इच्छाओं और कल्पनाओं में हर क्षण भटकता रहता है।

यदि इस चंचल मन को नियंत्रित न किया जाए, तो न तो जीवन में लक्ष्य प्राप्त होता है और न ही संतोष। अतः यह दोहा एक व्यावहारिक चेतावनी भी है—कि मन का अनुशासन आवश्यक है।

“मन का भटकाव साधना में सबसे बड़ी बाधा है। ध्यान, पूजा, जप—ये सब तभी सार्थक होते हैं जब मन ईश्वर में एकाग्र हो। यदि मन इधर-उधर उड़ता रहे, तो साधना केवल एक बाहरी क्रिया बनकर रह जाती है। कबीर हमें बताते हैं कि सच्ची भक्ति और आत्मबोध तभी संभव है जब मन को प्रभु में टिकाया जाए।

दोहा का दूसरा भाग — “जो जैसी संगति करै, सो तैसा ही फल पाइ” — संगति के प्रभाव को दर्शाता है। व्यक्ति की संगति ही उसके विचार, आचरण और चरित्र का निर्धारण करती है।

-अच्छी संगति से सद्गुण, विनम्रता और आत्मिक उन्नति होती है।

-बुरी संगति से पतन, अहंकार और मोह का विस्तार होता है।

-यह सामाजिक चेतावनी भी है कि व्यक्ति को संगति सोच-समझकर करनी चाहिए, क्योंकि संग का प्रभाव सीधा मन और कर्म पर पड़ता है।

यह दोहा हमें अंततः यह सिखाता है कि:

“मन की दिशा ही जीवन की दिशा है।”

जिस संगति में मन लगेगा—चाहे वह संसार हो या ईश्वर—उसका ही परिणाम अंततः हमारे जीवन को दिशा देगा।

यदि मन संसार रूपी माया में रम गया, तो वह मोह, वासना, लोभ और अहंकार में उलझ जाएगा। लेकिन यदि वही मन संतों की संगति, ध्यान, भक्ति और आत्मचिंतन में लगे, तो उसे शांति, ज्ञान और मुक्ति का मार्ग मिलेगा।

इसलिए कबीर का यह दोहा हमें प्रेरित करता है कि हम:

-मन को सजगता से साधें,

-और ऐसी संगति चुनें जो आत्मा को ऊपर उठाए, न कि नीचे गिराए।

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