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आचार्य श्री वर्धमान सागर जी का 34 साधुओं सहित मंगल प्रवेश : मुनि श्री विनम्र सागर जी ने चरण वंदना कर भव्य अगवानी की


भगवान की प्रतिमा उपदेश देती है कि रत्नत्रय मार्ग से शाश्वत मोक्ष सुख प्राप्त होता है। जिन्होंने आत्मा को पहचान लिया वही आत्म साधक होते हैं। यह उद्गार आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने मालवीयनगर में प्रवेश के बाद व्यक्त किए। जयपुर से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह खबर…


जयपुर। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी का 34 साधुओं सहित 8 मार्च को प्रातः मालवीय नगर प्रवेश हुआ। मुनि श्री विनम्र सागर जी द्वारा चरण वंदना मालवीय नगर चौराहे पर की गई। देश के वरिष्ठतम 76 वर्षीय 58 वर्ष का संयम दीक्षाकाल राजस्थान शासन के राजकीय अतिथि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने नगर प्रवेश पर आयोजित धर्मसभा में देशना में बताया कि मुनि श्री द्वारा चरण वंदना ,आचार्य भक्ति अन्य साधुओं से मिलन आदर्श अनुकरणीय वात्सल्य मिलन है। इसके पूर्व 1993 में मुनि श्री योगसागर भी पांच साधुओं सहित श्रवणबेलगोला हमारे साथ 8 माह रहे। अब इन साधुओं में आज दर्शन किए हैं। तीन और पांच का अंक महत्वपूर्ण है। तीन रत्नत्रय का प्रतीक है। पांच पंच परमेष्ठी का प्रतीक है। दोनों का योग 8 कर्मों को नाश करने का संदेश देता है। सुखी होने के लिए रत्नत्रय धर्म सम्यक दर्शन, सम्यकज्ञान और सम्यक चारित्र धारण करना होता है।संसारी प्राणी के जीवन में दु:ख ही दु:ख है। आप लोगों के दु:खी चेहरे देखकर हम साधु वैराग्य लेते हैं। संसारी प्राणी का जीवन धर्म के विपरीत होने के कारण होने के कारण शाश्वत मोक्ष रूपी लक्ष्य नहीं मिलता है।

इसके पूर्व आचार्य श्री ज्ञानसागर जी और आचार्य श्री धर्मसागर जी, मुनि विद्यासागर जी और हम मुनि अवस्था में 17 दिनों तक किशनगढ़ में सन 1971 में साथ में रहे। राजेश पंचोलिया ने बताया कि आचार्य श्री ने उपदेश में आगे बताया कि आचार्य का पद पंच परमेष्ठि का पद है आचार्य श्रावकों, साधुओं को शिक्षा ,दीक्षा, प्रायश्चित देते हैं। साधु आत्म साधना करते हैं, आत्मा को जिन्होंने पहचान लिया है, वही आत्मसाधक होते हैं। देव शास्त्र गुरु की विनय सभी को करना चाहिए। भगवान ने भी सम्यक दर्शन प्राप्त करने के बाद सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र को प्राप्त कर किया है। भगवान का चेहरा उपदेश देता है कि रत्न्त्रय धर्म का मार्ग भी शाश्वत सुख और मोक्ष मार्ग देता है। आज आचार्य श्री संघ की भव्य अगवानी में हाथी अश्व शामिल रहे और सैकड़ों महिलाओं ने मंगल कलश धारण किए। जगह-जगह पर आचार्य श्री की मंगल आरती हुई। धर्मसभा में प्रवचन के पूर्व श्रीजी का पंचामृत अभिषेक आचार्य श्री वर्धमान सागर जी और मुनि श्री विनम्रसागर जी संघ सानिध्य में हुआ। आचार्य श्री के प्रवचन के पूर्व मुनि श्री विनम्रसागर जी ने आचार्य श्री का गुणानुवाद कर बताया कि दीक्षा गुरु आचार्य श्री विद्यासागर जी के संघ में 20 वर्षों के सानिध्य में जो चरण वंदना करते थे। वहीं विशुद्धि वही भाव स्नेह सुखद अनुभूति आज हुई। इसी कारण आचार्य श्री आपका वात्सल्य वारिधी नाम सार्थक है। आचार्य निर्मल चारित्र के धारक होकर भगवान के प्रति रूप है। आचार्य श्री के चरण प्रक्षालन महावीर गोदिका परिवार और जिनवाणी भेंट दुलीचंद उत्तमचंद परिवार द्वारा की गई। चित्र अनावरण विधायक एवं मंदिर समिति ने किया।

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