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आर्यिका श्री अपूर्वमति माताजी एवं अनुत्तरमति माताजी का मंगल विहार चन्देरी की ओर : इतिहास, तप और जैन संस्कृति के पुनर्जागरण का शुभ संकेत


आचार्य श्री समयसागर जी महाराज की आज्ञा से आर्यिका श्री अपूर्वमति माताजी एवं आर्यिका श्री अनुत्तरमति माताजी का मंगल विहार आहारजी से ऐतिहासिक नगरी चन्देरी की ओर जारी है। प्रस्तावित चातुर्मास के साथ चन्देरी की प्राचीन जैन धरोहर पुनः चर्चा के केंद्र में है। पढ़िए श्रीफल साथी की यह रिपोर्ट।


चन्देरी। परम पूज्य आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज की पावन शिष्या एवं आचार्य श्री 108 समयसागर जी महाराज की आज्ञा से आर्यिका रत्न श्री 105 अपूर्वमति माताजी एवं श्री 105 अनुत्तरमति माताजी का मंगल विहार अतिशय क्षेत्र आहारजी से प्रारम्भ होकर ऐतिहासिक एवं आध्यात्मिक नगरी चन्देरी की ओर अग्रसर है। यह मंगल विहार केवल धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि चन्देरी की प्राचीन जैन संस्कृति, तप परम्परा और आध्यात्मिक चेतना के पुनर्जागरण का संदेश लेकर आया है।

इतिहास और जैन संस्कृति की अमूल्य धरोहर

चन्देरी का नाम जैन इतिहास में अत्यंत गौरवपूर्ण रहा है। महाभारतकालीन राजा शिशुपाल की राजधानी मानी जाने वाली बूढ़ी चन्देरी आज भी अपने प्राचीन जिनालयों, भग्न मंदिरों और ऐतिहासिक अवशेषों के माध्यम से समृद्ध जैन परम्परा की गवाही देती है। पुरातत्व विभाग द्वारा चिन्हित अनेक ऐतिहासिक स्थलों का वैज्ञानिक उत्खनन भविष्य में जैन इतिहास के नए अध्याय सामने ला सकता है।

तप, साधना और शास्त्र परम्परा की भूमि

चन्देरी मूलसंघ–बलात्कारगण–सरस्वतीगच्छ तथा शुद्ध तेरापंथ आम्नाय (परवार पट्ट) की गौरवशाली परम्पराओं का प्रमुख केंद्र रहा है। तारणतारण स्वामी की साधना, लगभग 250 वर्षों तक ‘समयसार’ ग्रंथ की वाचन परम्परा तथा अनेक आचार्यों और भट्टारकों की धर्मप्रभावना ने इस क्षेत्र को विशिष्ट आध्यात्मिक पहचान प्रदान की।

विश्वविख्यात जैन धरोहरें

थूबोन स्थित खजुराहो शैली का भगवान शांतिनाथ जिनालय, भियादांत जी की गुफा, 42 फीट ऊँची भगवान आदिनाथ की प्रतिमा, कान-क्षेदन युक्त दुर्लभ जिन प्रतिमाएँ तथा चन्देरी संग्रहालय की जैन पुरातत्व दीर्घा इस क्षेत्र की ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक समृद्धि को प्रदर्शित करती हैं। धर्मसम्राट पंडाशाह और लाला सवा सिंह जैसे धर्मनिष्ठ व्यक्तित्वों का योगदान भी चन्देरी की गौरवगाथा का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

चातुर्मास से बढ़ेगी धर्म प्रभावना

आर्यिका श्री अपूर्वमति माताजी एवं आर्यिका श्री अनुत्तरमति माताजी का प्रस्तावित चातुर्मास चन्देरी में स्वाध्याय, संयम, तप, धर्मचर्चा और संस्कारों का नया वातावरण निर्मित करेगा। इससे क्षेत्र में आध्यात्मिक चेतना का व्यापक प्रसार होने की अपेक्षा व्यक्त की जा रही है।

संरक्षण का सामूहिक संकल्प आवश्यक

समाज के प्रबुद्धजनों का मानना है कि यदि शासन, पुरातत्व विभाग और समाज मिलकर चन्देरी की जैन धरोहरों के संरक्षण और प्रचार-प्रसार का अभियान चलाएँ, तो यह नगरी पुनः विश्व के प्रमुख जैन आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक केन्द्रों में अपना गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त कर सकती है।

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