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अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज ने गणधर विलय महामंत्र के 48 मंत्रों पर प्रवचनों की श्रृंखला शुरू की : णमो जिणाणं के अर्थ और महत्व के बारे में बताया 


श्री 1008 मुनिसुव्रत नाथ दिगम्बर जैन मंदिर, स्मृति नगर में आचार्य श्री अभिनंदन सागर महाराज के शिष्य अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज के गणधर विलय महामंत्र के 48 मंत्रों पर प्रवचनों की श्रृंखला शुरू हो गई है। वह प्रतिदिन एक-एक मंत्र की व्याख्या कर उसका महत्व बताएंगे। पढ़िए एक रिपोर्ट…


इंदौर। श्री 1008 मुनिसुव्रत नाथ दिगम्बर जैन मंदिर, स्मृति नगर में आचार्य श्री अभिनंदन सागर महाराज के शिष्य अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज के गणधर विलय महामंत्र के 48 मंत्रों पर प्रवचनों की श्रृंखला शुरू हो गई है। वह प्रतिदिन एक-एक मंत्र की व्याख्या कर उसका महत्व बताएंगे। पहले दिन उन्होंने पहले मंत्र णमो जिणाणं के अर्थ और महत्व के बारे में बताया।

उन्होंने कहा कि णमो जिणाणं का अर्थ है जिनों को नमस्कार हो। जिन दो प्रकार के होते हैं। एक देश और सकल देश। आचार्य, उपाध्याय और साधु परमेष्ठि यह देश जिन है और अरिहंत व सिद्ध परमेष्ठि सकल देश जिन है। दोनों ही जिन में रत्नत्रय पाया जाता है। लोक में जितने भी निर्गंथ साधु हैं वह सब जिन हैं। णमोकार मंत्र का छोटा स्वरूप णमो जिणाणं है। इसमें पांचों परमेष्ठि आ गए हैं।

इस मंत्र का जाप करने से अतिसार(हैजा) रोग दूर होता है। मंदिर का शिखर या साधु दूर से दिखाई दे तो मन-वचन और काय की शुद्धि के साथ “णमो जिणाणं” का उच्चारण कर लेना चाहिए। इससे अनेक कर्मो की निर्जरा प्रारंभ होना शुरू हो जाती है। इस मंत्र यह विशेषता है कि इसमें मात्र दिगंबर साधुओं या निर्गंथ मुद्रा को नमस्कार किया गया।

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