जयपुर में विराजित आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने संघ सहित प्राचीन जैन मंदिरों के दर्शन कर जिनवाणी और दुर्लभ ग्रंथों का अवलोकन किया। उन्होंने श्रावकों को धर्म पालन और अहिंसा का संदेश दिया। — रिपोर्टर: राजेश पंचोलिया
जयपुर ।वात्सल्य वारिधि पंचम पट्टाधीश 108 आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज 34 साधुओं के साथ पाटौदी जी के मंदिर, मोदी खाना चौकड़ी, जयपुर में विराजमान हैं।प्रातःकाल श्री जी के अभिषेक के पश्चात, संघ सहित निकट स्थित मंदिरों की समितियों के निवेदन पर आचार्य श्री ने आसपास के अनेक प्राचीन जैन मंदिरों के दर्शन किए।
दुर्लभ जिनवाणी और ग्रंथों का अवलोकन
कई वर्षों बाद इन मंदिरों में पहुंचकर आचार्य श्री ने प्राचीन प्रतिमाओं, जिनवाणी साहित्य एवं हस्तलिखित दुर्लभ ग्रंथों का अवलोकन किया और अपनी प्रसन्नता व्यक्त की।
धर्म का सरल संदेश
राजेश पंचोलिया के अनुसार, आचार्य श्री ने अपने उपदेश में कहा कि प्रत्येक श्रावक का कर्तव्य है कि वह देव दर्शन, अभिषेक, पूजन, स्वाध्याय, दान, तप और उपवास जैसे आवश्यक धार्मिक कार्य नियमित रूप से करे।
अहिंसा की गहरी व्याख्या
आचार्य श्री ने बताया कि मन, वचन और शरीर से क्रोध, मान, माया और लोभ के साथ किसी भी जीव को कष्ट देना ही हिंसा है, जबकि अपने भावों में राग-द्वेष का अभाव ही सच्ची अहिंसा है।
गुरु भक्ति और जिनवाणी भेंट
इस अवसर पर आचार्य श्री के गृहस्थ अवस्था में आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत प्रदाता आचार्य श्री विमल सागर जी मुनिराज के शिष्य उपाध्याय श्री उर्जयंत सागर जी ने आचार्य श्री के दर्शन कर चरण वंदना की तथा जिनवाणी भेंट कर गुरु भक्ति प्रकट की।













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