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तप और सरल चर्या से संयम सीखा गए आचार्य श्री अजित सागर जी : एक मई को समाधि दिवस पर पुण्य स्मरण का पावन अवसर


 जैन धर्म में समाज को त्याग, सादा जीवन, सहृदयता के साथ धर्म पालन की शिक्षा देने वाले साधु वंदनीय हैं। आचार्य श्री अजित सागर जी महाराज के जीवन वृत्त से संस्कारों की अकूत संपदा के दर्शन होते हैं, जो सहजता, सरलता और धैर्य की शिक्षा देते हैं। ऐसे ही महामुनिराज आचार्य श्री अजित सागर जी के एक मई को समाधि दिवस पर यह विशेष आलेख श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रृंखला में आज पढ़िए…संकलन उप संपादक प्रीतम लखवाल का। 


आचार्य श्री 108 अजित सागर जी महाराज जैन धर्म के उन महान संतों में से हैं, जिन्होंने अपनी तपस्या और सरल चर्या से समाज को नई राह दिखाई। उनके समाधि दिवस पर हम उनके जीवन दर्शन और संयम के मार्ग का स्मरण करते हैं। आचार्य श्री अजित सागर जी का जन्म 1926 में मप्र के आष्टा नगर के समीप भौरा ग्राम में हुआ था। उनके पिता का नाम जवरचंद्र और माता का नाम रूपाबाई था। बचपन से ही धार्मिक संस्कारों में पले-बढ़े आचार्य श्री ने 1961 में राजस्थान के सीकर में आचार्य श्री108 शिवसागर जी महाराज से मुनि दीक्षा ग्रहण की।

आचार्य पद और योगदान

वे त्याग और वैराग्य की प्रतिमूर्ति थे। उन्हें 1987 में उदयपुर में चतुर्विध संघ द्वारा ‘आचार्य पद’ से विभूषित किया गया। उनके मार्गदर्शन में अनेकों शिष्यों ने संयम का मार्ग अपनाया। उन्होंने जैन दर्शन के प्रचार-प्रसार और मंदिरों के जीर्णोद्धार के लिए सतत कार्य किया, जिससे समाज में आध्यात्मिक जागृति आई।

समाधि और सल्लेखना की साधना

आचार्य श्री ने अपने जीवन के अंतिम क्षणों को बहुत ही गरिमामय और तपस्वी रूप में व्यतीत किया। उन्होंने 1990 में राजस्थान के सबला ग्राम (डूंगरपुर) में उत्तम सल्लेखना धारण की और शांत भाव से अपनी नश्वर देह का त्याग किया। उनकी समाधि को आज भी एक महान आध्यात्मिक उपलब्धि के रूप में याद किया जाता है, जो यह सिखाती है कि मृत्यु को भी उत्सव कैसे बनाया जा सकता है।

शिक्षाएं और आदर्श

आचार्य श्री का जीवन “ज्ञान, ध्यान और तप” का त्रिवेणी संगम था। वे कहते थे कि सच्चा शिष्य वही है जो गुरु की आज्ञा का पालन करे और परिग्रह से मुक्त होकर आत्म-कल्याण के मार्ग पर चले। उनके समाधि दिवस पर विशेष अनुष्ठान और पूजन का आयोजन किया जाता है, जिसमें श्रद्धालु उन्हें अपनी भावांजलि अर्पित करते हैं। उनका जीवन हमें संयम, क्षमा और परोपकार की राह पर चलने की प्रेरणा देता रहेगा। आचार्य श्री 108 अजितसागर जी महाराज का जीवन साहित्य सृजन और भव्य धार्मिक अनुष्ठानों के माध्यम से धर्म की प्रभावना में समर्पित रहा। उनके द्वारा रचित ग्रंथ और संपन्न कराए गए अनुष्ठान जैन दर्शन की गहराई को दर्शाते हैं।

प्रमुख ग्रंथ एवं साहित्य सृजन

आचार्य श्री ने अपनी लेखनी के माध्यम से दर्शन और अध्यात्म को जन-जन तक पहुँचाया।

भीतर कहीं: यह उनकी एक महत्वपूर्ण कृति है, जो इनसाइक्लोपीडिया ऑफ जैनिज्म के अनुसार भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित हुई है।

विद्यावाणी और वीरदेशना: इनके माध्यम से उन्होंने भगवान महावीर के सिद्धांतों और अपने गुरुओं की शिक्षाओं को संकलित किया।

मानस मोती (भाग 1-2): यह कृति साधकों के लिए आध्यात्मिक मार्गदर्शन का कार्य करती है।

अन्य रचनाएँ: उन्होंने ‘साधनापक्ष का पाक्षेय’, ‘अहिंसासूत्र’, ‘महाश्रमण’, और ‘विद्याशांति’ जैसी अनेक कृतियों की रचना की, जो दिगंबर जैन आगम के सार को सरल भाषा में प्रस्तुत करती हैं।

विशेष अनुष्ठान एवं धर्म प्रभावना

आचार्य श्री के सानिध्य में जैन धर्म की प्रभावना हेतु कई ऐतिहासिक अनुष्ठान संपन्न हुए, जिन्होंने समाज में नई चेतना जाग्रत की:

पंचकल्याणक प्रतिष्ठा: उनके मार्गदर्शन में 12 से अधिक पंचकल्याणक और गज रथ महोत्सव संपन्न हुए, जो तीर्थंकरों के जीवन की घटनाओं को जीवंत करते हैं

विधान आयोजन: समाज में शांति और भक्ति के संचार के लिए उन्होंने 6 नगरों में कल्पद्रुम मंडल विधान, 7 सिद्धचक्र विधान और नंदीश्वर विधान जैसे अनुष्ठान कराए।

जीर्णोद्धार और शिक्षा: उन्होंने लगभग 25 नगरों के मंदिरों का जीर्णोद्धार कराया और 30-35 नगरों में जैन पाठशालाओं का संचालन शुरू कराया ताकि आने वाली पीढ़ी संस्कारों से जुड़ सके।

वेदी प्रतिष्ठा: उन्होंने 26 नगरों में वेदी प्रतिष्ठाएँ संपन्न कराकर जिनेंद्र देव की आराधना हेतु पवित्र स्थानों का सृजन किया।

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