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सहारनपुर में 30 पीछीधारी संतों का दुर्लभ सानिध्य : आपका अभिमान बताता है, आप गुणवान नहीं हैं – आचार्य विमर्शसागर जी


सहारनपुर में आचार्य श्री विमर्शसागर जी महामुनिराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि मनुष्य यदि अपने छोटे-से गुणों पर अभिमान करता है तो वह वास्तविक गुणवान नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सच्चा गुणवान वही है, जो जिनेन्द्र भगवान की भक्ति और शरण में है। पढ़िए सोनल जैन की ख़ास रिपोर्ट…


उत्तरप्रदेश के सहारनपुर में इस वर्ष का विशेष संयोग बना है, जब संध शिरोमणि भावलिंगी संत दिगम्बराचार्य श्री 108 विमर्शसागर जी महामुनिराज अपने 30 पीछीधारी संतों के साथ 30वें चातुर्मास हेतु धर्मप्रभावना कर रहे हैं। सुबह 8 बजे आयोजित “श्री भक्तामर शिक्षण शिविर” में आचार्यश्री ने भगवान की भक्ति के महत्व का सरल और गहन बोध कराया। वीरोदय तीर्थ मंडपम् में धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्यश्री ने कहा कि जब मनुष्य पूर्व पुण्योदय से कुछ उपलब्धियाँ प्राप्त करता है और समाज में थोड़ी-सी प्रतिष्ठा मिलती है, तब वह स्वयं को सर्वश्रेष्ठ समझने लगता है। यही अहंकार उसे पतन की ओर ले जाता है। उन्होंने कहा – “अपने थोड़े से गुणों का अभिमान करने वाला कभी वास्तविक गुणवान नहीं हो सकता।”

जिनेन्द्र भगवान अनंत गुणों के धारी हैं

आचार्यश्री ने कहा कि जिनेन्द्र भगवान अनंत गुणों के धारी हैं, जिनकी भक्ति करने वाले स्वयं प्रभु स्वरूप हो जाते हैं। “जीवन है पानी की बूंद” महाकाव्य का उल्लेख करते हुए उन्होंने नवीन छंद सुनाया – “प्रभु गुणखान कहाते हैं, प्रभु गुणवान कहाते हैं। जो प्रभु भक्ति करते हैं, स्वयं प्रभु बन जाते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि संसार में प्रत्येक वस्तु की उपमा दी जा सकती है, किन्तु जिनेन्द्र भगवान उपमातीत और अनुपमेय हैं। वे केवल अपने समान ही हैं, उनसे अधिक गुणवान कोई नहीं है। इस अवसर पर नगरवासियों ने संत संघ के इस दुर्लभ सानिध्य को अपना सौभाग्य माना और धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।

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