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भगवान चंद्रप्रभ जी का जन्म एवं तप कल्याणक 15 दिसंबर को : पौष मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि पर होते हैं धार्मिक कार्यक्रम 


जैन धर्म के प्रवर्तक और 8वें तीर्थंकर भगवान चंद्रप्रभ जी का जन्म एवं तप कल्याणक इस बार 15 दिसंबर को मनाया जाएगा। यह दोनों कल्याणक पौष मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी को आते हैं। इस दिन दिगंबर जैन मंदिरों में भक्तिपूर्ण आराधना का दौर रहता है। श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रृंखला में आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित और संपादित प्रस्तुति…


इंदौर। जैन धर्म के प्रवर्तक और 8वें तीर्थंकर भगवान चंद्रप्रभ जी का जन्म एवं तप कल्याणक इस बार 15 दिसंबर को मनाया जाएगा। यह दोनों कल्याणक पौष मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी को आते हैं। जैन धर्म ग्रंथों में वर्णित जानकारी के अनुसार 8वें तीर्थंकर भगवान चंद्रप्रभजी का जन्म चंद्रपुरी (बनारस) में राजा महासेन और रानी लक्ष्मणा के यहां पौष मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को हुआ और इसी दिन उन्होंने दीक्षा (तप) भी धारण की, जिससे यह दिन दिगंबर जैन धर्मावलंबी जन्म एवं तप कल्याणक के रूप में मनाते आ रहे हैं। भगवान चंद्रप्रभ जी के बारे में प्राप्त जानकारी के अनुसार उनकी गौर वर्ण काया है और चंद्र चिह्न प्रमुख हैं और उन्होंने सम्मेद शिखर से मोक्ष प्राप्त किया। आठवें तीर्थंकर चंद्रप्रभ का जन्म भी पौष कृष्ण एकादशी को ही राजघराने में हुआ था। इनके माता-पिता बनने का सौभाग्य चंद्रावती के महाराजा महासेन और लक्ष्मणा देवी को मिला। भगवान चंद्रप्रभु के जन्म, तप एवं ज्ञान कल्याणक स्थली क्षेत्र सुरम्य गंगातट पर चंद्रावती गढ़ के भग्नावशेषों के बीच स्थित है। क्षेत्र पर चैत्र कृष्ण पंचमी को वार्षिक मेला लगता है। यहां चंद्राप्रभु का भव्य मंदिर आस्था का केंद्र है लेकिन गंगा की कटान की वजह से यह तीर्थ बदहाल पड़ा है। वर्तमान मंदिर की वेदी में मूलनायक तीर्थंकर चंद्रप्रभ की श्वेत पाषाण की पद्मासन प्रतिमा है।

मंदिर का शिखर बहुत ही सुंदर बना हुआ है। यहां से गंगा का मनोहारी दृश्य बहुत ही आकर्षक लगता है, जो अवलोकनीय है। गंगा नदी के तट पर बना हुआ जिनालय स्थापत्य कला को सुशोभित कर रहा है। मंदिर का निर्माण प्रभुदास जैन ने किया था। इनके परिवारजन अजय जैन, प्रशांत जैन आरा आदि आज भी इस क्षेत्र की देख-रेख में लगे हुए हैं। उल्लेखनीय है कि भगवान चंद्रप्रभ को इतिहास का स्वरूप धारण कराने में आचार्य समन्तभद्र स्वामी का बड़ा हाथ है। जब उन्हें भस्मक व्याधि हो गयी थी। उस समय काशी में उनके साथ जो घटनाक्रम हुआ, वह ऐतिहासिक था। इस ऐतिहासिक घटना ने जनमानस पर गहरा प्रभाव छोड़ा और कलाकार चंद्रप्रभु की कलाकृतियां गढ़ने में तत्पर हो गए और श्रावक जन भगवान चंद्रप्रभु के चमत्कार के प्रति अधिक आस्थावान और विश्वस्त हो गए। चंद्रावती के अलावा देवगढ़ , खजुराहो, सोनागिर, तिजारा, ग्वालियर, श्रवणबेलगोला , बरनावा, मांगीतुंगी आदि में चंद्रप्रभु भगवान की प्राचीन और चमत्कारी प्रतिमाएं विराजमान हैं।

तीर्थंकर चंद्रप्रभु अपनी अद्वितीय धवल रूप गरिमा में वीतरागता का वैभव बिखेरने के साथ अपने अद्वितीय अतिशय और चमत्कारों के कारण भी लोकप्रिय संकट मोचन रहे हैं। तीर्थंकर चन्द्रप्रभु का आदर्श मानव को सावधान करता है, उसे जगाता है और कहता है कि हमारी तरफ देख, हमने राजा का वैभव को ठुकराया और आकिंचन व्रत अंगीकार किया और तू इस नाशवान माया की ममता में पागल हुए जा रहा है।

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