आचार्य श्री विराग सागर जी महाराज की शिष्या आर्यिका विदुषी श्री माताजी ससंघ सान्निध्य में चल रहे नव दिवसीय इंद्रध्वज महामंडल विधान का समापन विश्वशांति महायज्ञ के साथ हुआ। विधानाचार्य अन्नू भैया के निर्देशन में इंद्र इंद्राणियों ने वैदिक मंत्रोच्चार के साथ यज्ञ में आहुतियां दीं। मनावर से पढ़िए, यह खबर…
मनावर। इस धर्म नगरी में आचार्य श्री विराग सागर जी महाराज की शिष्या आर्यिका विदुषी श्री माताजी ससंघ सान्निध्य में चल रहे नव दिवसीय इंद्रध्वज महामंडल विधान का समापन विश्वशांति महायज्ञ के साथ हुआ। विधानाचार्य अन्नू भैया के निर्देशन में इंद्र इंद्राणियों ने वैदिक मंत्रोच्चार के साथ यज्ञ में आहुतियां दीं। श्रीजी को रजत विमान में विराजमान कर बैंडबाजे की भक्तिमय धुनों के साथ पार्श्वनाथ जिनालय से भव्य शोभायात्रा निकाली गई। इसमें नगर के प्रमुख मार्गाे से होते हुए हजारों श्रद्धालु शामिल हुए। जैन समाज के अध्यक्ष अभय सोगानी ने बताया कि पार्श्वनाथ जिनालय इंद्र भवन में आर्यिका संघ के सानिध्य में पिच्छिका परिवर्तन समारोह हुआ। कार्यक्रम की शुरुआत चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन, पाद प्रक्षालन और अष्ट द्रव्य पूजन से हुई। आर्यिका विदुषी श्री माताजी,विनीत श्री माताजी, विकम्पा श्री माताजी, विरत श्री माताजी,विनोद श्री माताजी को क्रमशः सकल जैन समाज ने नवीन पिच्छिका भेंट की।
इन्हें प्राप्त हुआ पुरानी पिच्छी प्राप्त करने का सौभाग्य
आचार्य श्री विशुद्ध सागर महाराज की पुरानी पिच्छिका लेने का सौभाग्य मुनि श्री प्रभात सागर जी, आर्यिका विदुषी श्री माताजी की पिच्छिका अनुराग जैन, विनीत श्री माताजी की पिच्छिका अभिषेक सोगानी, विकम्पा श्री माताजी की आयुष जैन, विरत श्री माताजी की प्रतीक बडजात्या बाकानेर, विनोद श्री की पिच्छिका आरसी जैन परिवार को प्राप्त हुआ। विश्व शांति महायज्ञ एवं पिच्छिका परिवर्तन समारोह में बाकानेर, सिंघाना, गंधवानी, डेहरी सहित निमाड़ क्षेत्र से आए श्रद्धालुओं ने भाग लिया।
संसार भी परिवर्तनशील है
इस अवसर पर विदुषी श्री माताजी ने कहा कि दिगंबर साधु केवल तीन उपकरणों ज्ञान के लिए शास्त्र, शौच के लिए कमंडल और संयम के लिए पिच्छिका का ही उपयोग करते हैं। पिच्छिका उनके लिए अहिंसा और करुणा का प्रतीक है। जिसमें सूक्ष्म जीवों की रक्षा होती है। बिना पिच्छिका के दिगंबर साधु सात कदम भी नहीं चलते हैं। माताजी ने कहा कि जिस प्रकार पिच्छिका का परिवर्तन हो रहा है। उसी प्रकार संसार भी परिवर्तनशील है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में मोक्ष मार्ग पर चलने के लिए जीवन में परिवर्तन लाना चाहिए। समारोह का समापन श्रद्धा, भक्ति और संयम के भावों के साथ हुआ। जिसमें हजारों जैन समाज साक्षी बने।













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