अप्पोदया प्राकृत टीका पर त्रिदिवसीय राष्ट्रीय विद्वत् संगोष्ठी का आयोजन किया गया। आचार्य श्री विमर्शसागर जी ने श्री योगसार प्राकृत संस्कृत ग्रंथ पर एक हजार पृष्ठीय प्राकृत टीका का सृजन किया है। जो ‘अयोध्या’ नामक ग्रंथ के रूप में जन-जन के कल्याण में निमित्त बन रही है। 26 से 28 सितंबर में विद्वानों की नगरी देश के मूर्धन्य मनीषी विद्वानों ने स्वयं टीकाकर्ता आचार्य संघ के चरणों में बैठकर अप्पोट्या टीका के विभिन्न विषयों और पहलुओं पर विचार-विमर्श किया। सराहनपुर से पढ़िए, सोनल जैन की यह खबर…
सहारनपुर। अप्पोदया प्राकृत टीका पर त्रिदिवसीय राष्ट्रीय विद्वत् संगोष्ठी का आयोजन किया गया। आचार्य श्री विमर्शसागर जी ने श्री योगसार प्राकृत संस्कृत ग्रंथ पर एक हजार पृष्ठीय प्राकृत टीका का सृजन किया है। जो ‘अयोध्या’ नामक ग्रंथ के रूप में जन-जन के कल्याण में निमित्त बन रही है। 26 से 28 सितंबर में विद्वानों की नगरी देश के मूर्धन्य मनीषी विद्वानों ने स्वयं टीकाकर्ता आचार्य संघ के चरणों में बैठकर अप्पोट्या टीका के विभिन्न विषयों और पहलुओं पर विचार-विमर्श किया। अप्पोदया टीका संगोष्ठी मुख्य निदेशक सर्वाध्यक्ष डॉ. श्रेयांस कुमार जैन बड़ौत रहे। संयोजक पं. विनोदकुमार जैन रजवास रहे।
साथ ही प्रो. श्रीयांस जैन जयपुर, प्रो. नलिन के. शास्त्री दिल्ली, डॉ. राजकुमार उपाध्ये दिनी राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित डॉ. आशीष जैन, डॉ. सुनील जैन संचय, डॉ. बाहुबली जैन रजवाँस, डॉ. ज्योति बाबू उदयपुर, डॉ. आशीष जैन बम्हौरी आदि विद्वानों के साथ स्थानीय विद्वानों ने भी ज्ञान के महायज्ञ में अपनी आलेखों की प्रस्तुति दी। विद्वान बोले- भगवान महावीर स्वामी के बाद हमने संस्कृत ग्रंथों पर संस्कृत टीकाएं देखी हैं। हमने प्राकृत ग्रंथों पर संस्कृत टीकाएं बहुत देखी है किन्तु यह पहला अवसर है जब किसी जैनाचार्य द्वारा संस्कृत ग्रंथ पर प्राकृत भाषा में 1 हजार पृष्ठीय प्राकृत टीका का लेखन किया गया हो और इस महनीय श्रुत संवर्धन को अंजाम देने वाले हैं भावलिंगी संत श्रमणाचार्य श्री विमर्श सागर जी महामुनिराज।
अधिक से अधिक शोध कार्य होंगे
डॉ. राजकुमार उपाध्ये दिल्ली ने कहा कि पूज्यश्री द्वारा रचित यह अप्पोदया टीका सामान्य नहीं है। यह मात्र जैन समाज तक ही सीमित न रहे। यह जन-जन तक पहुंचनी चाहिए। यह जन-जन के हितार्थ विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में शामिल होनी चाहिए और ऐसा मैं कर सकूंगा मुझे विश्वास है। अप्योदया टीका से प्रभावित होकर विद्वानों ने कहा- पूज्यश्री द्वारा सृजित इस ग्रंथ में बहुतायत शोध के विषय हैं, जिन पर आगामी समय में बड़ी श्रृंखला में विद्वत्वर्ग के शोधकार्य (पीएचडी) हम सबके समक्ष उपस्थित होंगे। वर्तमान में डॉ. शैलेन्द्र शास्त्री भेलसी द्वारा (पीएचडी) पूर्णता की ओर है, जो जल्द ही हम सबके समक्ष उपस्थित होगी। आचार्य श्री की संघस्थ आर्यिका श्री विमर्शिता श्री माताजी द्वारा किया गया विनय भरा मंगलात्चरण, सुनकर डॉ. श्रेयांस कुमार जैन बड़ौत अभी दीक्षा को एक वर्ष भी पूर्ण नहीं हुआ और पूज्य माताजी की एक प्रस्तुति ने ही यह बतला दिया कि वे भविष्य में जैन धर्म की महानता करेंगी। इन सभी उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हैं।
रयणोदय भाग-3 का किया गया भव्य विमोचन
राजधानी दिल्ली कृष्णानगर की महिला जैन समाज के सौजन्य से प्रकाशित कराया गया ‘रयणोदय ग्रंथ’ का आगत सम्पूर्ण विद्वानों द्वारा भव्य विमोचन किया गया। ग्रंथ के संपादक डॉ. श्रेयांस कुमार जैन बड़ौत ने कहा कि श्री रयणसार ग्रंथ पर आचार्य श्री की यह प्रवचन वृत्ति जन सामान्य के कल्याण में निमित्त बन रही है। विद्वत् वर्ग को आचार्य श्री ने संबोधित करते हुए कहा कि आज आत्मोन्नति के उपाय रूप में संगोष्ठी जगह-जगह की जा रही हैं। इसके साथ आज समाजोन्नति पर भी विचार करने की महती आवश्यकता है। आज मंदिरों में द्रव्य पूजा को मुख्य करके समाज में विखंडन देखा जा रहा है, आज आवश्यकता है कि द्रव्य पूजा को गौण करके अर्थात जिसकी जैसी पद्धति है। वह उसे करने दें और भाव पूजा को मुख्यता प्रदान करें ताकि समाज में एकता, सौहाद्र का वातावरण निर्मित हो सके। द्रव्यपूजा में खींचतान के कारण आज जो मुख्य है अर्थात अंतरंग भाव पूजा नष्ट होती जा रही है। जहां भावपूजा खंडित हो गयी वहां आपकी द्रव्य पूजा आपको क्या फल प्रदान करेगी। इसीलिए मैं कहता हूँ गौण करके हमें भाव पूजा अर्थात भाव शुद्धि को ही महत्वता देनी होगी आज जैन समाज की हानि का मुख्य कारण है ‘विखंडन’। विखंडन में हमें भाव पूजा ही बचाने में समर्थ है।













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