आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी महाराज सानिध्य में मंगलवार की बेला में सिद्ध चक्र महामंडल विधान का शुभारंभ हुआ। प्रातः की बेला में श्री जी का अभिषेक शांतिधारा की गई। उसके उपरांत सभी क्रियाएं विधि विधान से संपन्न की गई एवं मंडल पर सिद्धों की आराधना करते हुए अर्घ्य समर्पित किए गए। रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर…
रामगंजमंडी। आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी महाराज सानिध्य में मंगलवार की बेला में सिद्ध चक्र महामंडल विधान का शुभारंभ हुआ। प्रातः की बेला में श्री जी का अभिषेक शांतिधारा की गई। उसके उपरांत सभी क्रियाएं विधि विधान से संपन्न की गई एवं मंडल पर सिद्धों की आराधना करते हुए अर्घ्य समर्पित किए गए। यह महामंडल विधान 28 सितंबर तक चलेगा। यह महामंडल विधान संघस्थ सभी ब्रह्मचारियों भैया बहनों द्वारा किया जा रहा है। आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी महाराज ने मंगल प्रवचन में सिद्धचक्र महामंडल विधान का महत्व समझाया और कहा कि ऐसे कर्म के उदय आते हैं कि हमारी सारी अनुकूलताएं समाप्त हो जाती हैं। आचार्य श्री ने कर्म के विषय में कहा कि कर्म आते समय दिखाई नहीं देते लेकिन, फल देते समय अनुभव में आते हैं। यह संसार में नीति नियम है जो करेगा वहीं भोगेगा और जैन दर्शन तो स्पष्ट रूप से ऐसा ही कहता है।
अच्छा बोया है तो अच्छा काटोगे
आचार्यश्री ने कहा कि परेशानी तकलीफ और अभाव में यही सोचना चाहिए कि यह कर्म किसने किए हैं। जब हम सोचते उत्तर यही आएगा यह कर्म आपने ही किए हैं। अगर हम दूसरों के कर्म भोगने लग जाए तो हमारी क्रिया और भाव का कोई महत्व नहीं रह जाएगा। इसका भावार्थ समझते हुए गुरुदेव ने कहा कि जो बोएगा वही काटेगा। बोया बाजरा है तो गेहूं कैसे काटोगे। अगर आपने अच्छा बोया है तो अच्छा काटोगे और अपने कम अच्छा बोया है तो कम अच्छा काटोगे और यदि बहुत बुरा बोया है तो बहुत बुरा ही काटना पड़ेगा। उन्होंने कहा यह रूल्स है। उन्होंने कहा कि दुनिया ने जिन्हें दुनिया से लेना देना नहीं है उन्हें व्यवस्थापक बना दिया। भगवान को कोई लेना-देना नहीं है। लेना देना तो हमें है। उन्होंने कहा कि मोहनीय कर्म आता है तब हमारी इच्छाएं होती हैं।
कर्म फल को समझना होगा
सिद्ध चक्र विधान सिर्फ सिद्धों की आराधना के लिए नहीं होता। यह कर्म और कर्म के फल को समझने के लिए होता है। यह समझने की जरुरत है। वर्तमान में कुछ नहीं किया है लेकिन, पहले इतना कुछ करके आए हैं। उनके फलों के कारण व्यक्ति को रोना पड़ता है, तकलीफ देखनी पड़ती है। कष्ट भोगना पड़ता है। जो कर्म हमने पहले किए हैं वह तो भोगना ही पड़ेगा। हमें समझने की जरूरत है। हमारा जीवन ऐसे ही नहीं चल रहा है, गाड़ी का उदाहरण देते हुए कहा कि कोई गाड़ी नहीं है जो स्टार्ट कर दी और आगे बढ़ गई। जीवन है यह कर्म के उदय के अनुसार चलता है। हमारी विशुद्धि में ही ताकत है जो पाप को पुण्य में बदल सकती है।













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