22 सितंबर को प्राकृत भाषा और जैन संस्कृति के संरक्षक आचार्य विद्यानंद जी की पुण्यतिथि है। उन्होंने प्राकृत भाषा को राष्ट्रपति भवन तक पहुंचाया, सरकार के अनुचित प्रतिबंधों का सामना किया और श्वेतपिच्छाचार्य के रूप में जैन समाज को गौरवान्वित किया। उनकी 94 वर्षों की जीवन यात्रा एक प्रेरणास्पद अध्याय है। पढ़िए पदम जैन बिलाला की रिपोर्ट…
आचार्य श्री 108 विद्यानंद जी महामुनिराज का जीवन जैन संस्कृति, धर्म और भाषा संरक्षण के इतिहास में अमर अध्याय है। 22 अप्रैल 1925 को कर्नाटक की पावन धरती पर उनका जन्म हुआ। धर्मरत्न आचार्य श्री देशभूषण जी महाराज की प्रेरणा और मार्गदर्शन में 25 जुलाई 1963 को उन्हें दीक्षा मिली और वे मुनि विद्यानंद बने।
आचार्य विद्यानंद जी ने अपने जीवन का ध्येय प्राकृत भाषा को पुनर्जीवित करना और जैन संस्कृति की रक्षा करना बनाया। उन्हें “सिद्धांत चक्रवर्ती” और बाद में “श्वेतपिच्छाचार्य” की उपाधियों से सम्मानित किया गया।
प्राकृत भाषा के मसीहा
आचार्य विद्यानंद जी ने प्राकृत भाषा को घर-घर से राष्ट्रपति भवन तक पहुंचाया। 9 जुलाई 1987 को नई दिल्ली स्थित कुंदकुंद भारती में “प्राकृत भवन” की स्थापना उनकी प्रेरणा से हुई। इस ऐतिहासिक भवन का उद्घाटन तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी ने किया था। उनके प्रयासों से प्राकृत भाषा का अध्ययन पुनः जीवित हुआ और आज अनेक विद्वान इस भाषा में रचनाएं कर रहे हैं।
शिष्य आचार्य वसुनंदि जी की परंपरा
आचार्य विद्यानंद जी के प्रिय शिष्य आचार्य वसुनंदि जी ने भी गुरु की परंपरा को आगे बढ़ाया। उन्होंने प्राकृत भाषा में कई टीकाएं और ग्रंथों की रचनाएं कीं और “प्राकृत भाषा चक्रवृत्ति” का अलंकरण प्राप्त किया। यह गुरु-शिष्य परंपरा जैन संस्कृति की अमूल्य धरोहर है।
मयूर पंख विवाद और श्वेतपिच्छाचार्य की उपाधि
साल 2010 में सरकार ने मयूर पंख पर प्रतिबंध लगाया। यह जैन साधु की पहचान और प्रतीक चिह्न होने से समाज में गहरी चिंता फैल गई। आचार्य विद्यानंद जी ने आगमों और ऐतिहासिक प्रमाणों के आधार पर केंद्र सरकार को पत्र लिखकर समझाया कि मयूर पंख धार्मिक चिह्न है। अंततः प्रतिबंध हटा लिया गया।
विदेशों से भक्तों ने श्वेत मयूर पंख मंगवाए और उनसे बनी श्वेत पिच्छी उन्हें भेंट की गई। उसी अवसर पर उपाध्याय प्रज्ञसागर जी ने उन्हें “श्वेतपिच्छाचार्य” की उपाधि दी और उपस्थित समाज ने अनुमोदन करते हुए जयघोष किया।
समाधि और युगांत
22 सितंबर 2019 को दिल्ली में 94 वर्ष की आयु में आचार्य विद्यानंद जी ने संल्लेखना पूर्वक समाधि ली। उनके प्रिय शिष्य आचार्य वसुनंदि जी उस समय उपस्थित थे। उनके देवलोक गमन को जैन समाज ने “एक युग का अंत” कहा।
अमर विरासत
आचार्य विद्यानंद जी केवल संत नहीं बल्कि विचारक, दार्शनिक, संगीतकार, संपादक और समाज सुधारक भी थे। उनका योगदान आज भी जैन समाज को प्रेरणा देता है। वे प्राकृत भाषा, जैन संस्कृति और साधु परंपरा के अमर प्रहरी रहेंगे।













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