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भोपाल विश्वविद्यालय में विद्यार्थियों को मुनि श्री ने दिया संयम और सादगी का संदेश : जीवन का असली उद्देश्य शांति, संतोष और पवित्रता है – मुनि श्री प्रमाण सागर


भोपाल के बरकतउल्ला विश्वविद्यालय में मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि केवल डिग्री और नौकरी पाना ही जीवन का उद्देश्य नहीं है, बल्कि शांति, संतोष, पवित्रता और आनंद की प्राप्ति ही असली सफलता है। पढ़िए अविनाश जैन विद्यावाणी की ख़ास खबर…


भोपाल के बरकतउल्ला विश्वविद्यालय में भावनायोग प्रणेता मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने छात्र-छात्राओं को संबोधित करते हुए कहा कि जीवन का उद्देश्य केवल पढ़ाई, डिग्री और नौकरी से धन कमाना नहीं है, बल्कि शांति, संतोष, पवित्रता और आनंद की प्राप्ति होना चाहिए। इस अवसर पर मुनि श्री संधान सागर महाराज सहित अन्य संत उपस्थित रहे।

कार्यक्रम का शुभारंभ मां सरस्वती के चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलन से हुआ। विश्वविद्यालय प्रशासन ने मुनि श्री के चरणों में श्रीफल अर्पित कर आशीर्वचन का अनुरोध किया। मुनि श्री ने कहा कि यदि मन में आनंद और प्रसन्नता न हो तो धन-संपन्नता का कोई अर्थ नहीं रह जाता। भारतीय संस्कृति सिखाती है कि पढ़ाई के साथ जीवन को भी पढ़ना आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि आज के विद्यार्थियों में पवित्रता, अनुशासन, संयम और सादगी की कमी देखने को मिलती है। शिक्षा के साधन बढ़े हैं, लेकिन व्यसन और एडिक्शन भी उतनी ही तेजी से बढ़े हैं। यह बदलाव नहीं बल्कि भटकाव है। मुनि श्री ने विद्यार्थियों से आह्वान किया कि वे अपने जीवन को रचनात्मकता और आध्यात्मिकता से जोड़ें।

कष्ट तभी तक कष्ट रहता है जब तक उसे स्वीकार न किया जाए

उन्होंने ए.पी.जे. अब्दुल कलाम और महात्मा गांधी का उदाहरण देते हुए कहा कि कठिन परिस्थितियों और सादगीपूर्ण जीवन ने ही उन्हें महान बनाया। विद्यार्थियों के प्रश्नों का उत्तर देते हुए मुनि श्री ने कहा कि विचार हमारी प्रवृत्ति से उत्पन्न होते हैं और भावनायोग के माध्यम से हम विचार व वाणी को शुद्ध कर सकते हैं। भगवान महावीर के कठिन जीवन पर प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा कि कष्ट तभी तक कष्ट रहता है जब तक उसे स्वीकार न किया जाए। जैसे ही हम कठिनाइयों को स्वीकार करते हैं, वे आनंद का साधन बन जाती हैं। उन्होंने प्रेरणा दी कि जीवन में कठिनाइयों को स्वीकार करने वाले ही उपलब्धियों के शिखर तक पहुँचते हैं। कार्यक्रम का संचालन अविनाश जैन विद्यावाणी ने किया। अंत में मुनिसंघ विद्याप्रमाण गुरुकुलम् वापस लौट गया।

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