आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने 16 कारण भावना अंतर्गत संवेग भावना की विस्तृत विवेचना करते हुए कहा कि मनुष्य जीवन में वैराग्य, व्रत संयम और रत्नत्रय से ही सच्चा धर्म धारण होता है। उन्होंने पांच पापों का त्याग, धर्म समागम और अहिंसा पालन को आत्मिक स्वतंत्रता का मार्ग बताया। पढ़िए पूरी रिपोर्ट…
15 अगस्त को देश की स्वतंत्रता का उल्लेख करते हुए आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने कहा कि जैसे हमारा देश वर्षों की गुलामी से मुक्त हुआ, वैसे ही हमारी आत्मा भी अनादिकाल से कर्मों के बंधन में बंधी हुई संसार में भटक रही है। आत्मा को भी इस बंधन से मुक्त कराना ही सच्चा उद्देश्य होना चाहिए। उन्होंने 16 कारण भावना में संवेग भावना की व्याख्या करते हुए बताया कि सम्यक दर्शन, शील, विनय और व्रत पालन से पाप रहित जीवन जीना संभव है। हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रह—इन पांच पापों का त्याग महाव्रती और अणुव्रती दोनों को करना चाहिए, क्योंकि यही पाप संसार भ्रमण का मुख्य कारण हैं और वैराग्य को बाधित करते हैं।
धर्म, तप और त्याग से ही आत्मा परमात्मा बन सकती है
राजकीय अतिथि वात्सल्य वारिधी पंचम पट्टाधीश 108 आचार्य श्री ने कहा कि आत्मा का स्वभाव भूलकर लोग शरीर को ही आत्मा मान बैठे हैं। पेंसिल की नोक जितने छोटे जीव में भी आत्मा होती है। उन्होंने सभी को पांच पापों से भयभीत होकर 16 कारण भावना, 12 भावना आदि के चिंतन का अभ्यास करने की प्रेरणा दी। आचार्य श्री ने रत्नत्रय को अनमोल रत्न बताते हुए कहा कि लोग असली रत्न की उपेक्षा कर नकली रत्न पहनते हैं, जबकि धर्म, तप और त्याग से ही आत्मा परमात्मा बन सकती है। संसार के दुखों से घबराकर धर्म चिंतन और स्वरूप की समझ के साथ दीक्षा लेने से मोक्ष मार्ग प्रशस्त होता है। उन्होंने यह भी बताया कि निर्दोष रीति से विधि-विनयपूर्वक स्वाध्याय करने वाले को उपवास का फल मिलता है और व्यक्ति के भाव एवं परिणाम के अनुसार उसकी गति निर्धारित होती है।
विद्यार्थियों को धार्मिक संस्कार देने के निर्देश दिए जाएंगे
प्रवचन से पूर्व मुनि श्री चिंतन सागर जी ने कहा कि संसार दुखों का सागर है और इससे भयभीत रहना ही संवेग भावना है। रमेश काला ने बताया कि 15 अगस्त को आचार्य संघ के सानिध्य में शिक्षाविदों का सम्मेलन आयोजित होगा, जिसमें शिक्षकों द्वारा चयनित विषयों पर विचार-विमर्श और विद्यार्थियों को धार्मिक संस्कार देने के निर्देश दिए जाएंगे।













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