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स्वयं मूल्यांकन करो आपने क्या किया और क्या पाया : आचार्य श्री विनिश्चसागर जी के प्रवचन में जीवन के मूल्यांकन पर जोर 


आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी के प्रवचन से पूर्व मंगलाचरण अभिषेक जैन ने किया। संचालन राजीव बाकलीवाल ने किया। इस अवसर पर महाराज श्री ने कहा कि भूख सबको लगती है लेकिन, भोजन करने का तरीका सबका अलग-अलग होता है। रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर…


रामगंजमंडी। आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी के प्रवचन से पूर्व मंगलाचरण अभिषेक जैन ने किया। संचालन राजीव बाकलीवाल ने किया। इस अवसर पर महाराज श्री ने कहा कि भूख सबको लगती है लेकिन, भोजन करने का तरीका सबका अलग-अलग होता है। कितने ऐसे समय, कितने घंटे, कितने दिन आपके पास आते हैं कि आप लोगों को जड़ से उखाड़ना चाहते हैं। उस समय जन्म लेने वाले परिणाम काले होते हैं। आपने तो कह दिया कि देख लूंगा, बस चलता तो छोड़ता नहीं तुम्हें, ऐसा सोचकर पूरी आत्मा पर कालिख पोत दी। मुनिश्री ने कहा कि सबको याद है जब आप पढ़ते थे तो मूल्यांकन होता था। हर महीने टेस्ट होता था, बच्चों का मूल्यांकन होता था। कॉपी बनती थी जिसमें माह भर बाद कुछ प्रश्न दिए जाते थे और उन प्रश्नों को हल करना पड़ता था। आज भी टेस्ट इसलिए होते है यह पता पड़ता है कि हमने क्या सीखा है। लोगों का पूरा जीवन निकल जाता है लेकिन, वो मूल्यांकन नहीं कर पाते हैं। 5 वर्ष 10 वर्षों में मैंने क्या पा लिया है और क्या खो दिया है। यह मूल्यांकन होना ही चाहिए कि इन 10 वर्षों में क्या किया। हमने इसका मूल्यांकन नहीं किया, उन्होंने जोर देते हुए कहा कि पड़ोसी का मूल्यांकन करना बड़ा अच्छे तरीके से आता है। यदि आपको कोई वस्तु मिल जाए, बस तो ऐसी होनी चाहिए वस्तु वैसी होनी चाहिए। उसका मूल्यांकन आप तुरंत करते हैं। खुद का मूल्यांकन करने की हमने कोशिश ही नहीं की। हम पूरे काले हो गए लेकिन, हम तो आईने सामने देखकर चेहरे को संभालते हैं। यह तो गोरा है, गोरे होने से आत्मा के काले होने से कोई फायदा नहीं चेहरा तो काला भी चल जाता है लेकिन, आत्मा गोरी होनी चाहिए।

मंदिर विकल्पों का विराम स्थान होता है

हमने भाव इतने निम्न बना लिए की हम हिंसा के लिए उतारू हो गए हम इसे छोड़ेंगे नहीं जड़ से उखाड़ कर फेक देंगे। उन्होंने कहा कि डांटना मारना हर समय बुरा नही होता। आत्मा किसी भी समय हिंसा को स्वीकार नहीं करती। ऐसे विचार समझदारी धार्मिकता एवं धार्मिक विचारों में ऐसा हो सकता है। हम किसी को जब भी डाटे गुस्सा करे तब यह प्रयोजन होना चाहिए हमारे अंदर कषायो की मंदता होनी चाहिए। उन्होंने कहा मंदिर विशुद्धता का स्थान है आप जब अपने भीतर देखते हैं तो जो है वह होना नहीं चाहिए जो होना चाहिए, वह हो नहीं रहा है। मंदिर विकल्पों का विराम स्थान होता है। मंदिर अशुभ भावना के विसर्जन का स्थान होता है। मंदिर में बैठकर विकल्पों को स्थान दे रहे हैं तो शुभ लेश्या की उम्मीद नहीं की जा सकती। शुभ लेश्या में मंदिर आएगे तो अध्यात्म आनंद की अनुभूति होगी।

 जैनों के रक्त का परीक्षण कराया जाए तो रक्त क्षत्रियों जैसा 

आचार्य श्री ने कहा कि जैन क्षत्रिय हैं। यदि जैनियों के रक्त का परीक्षण कराया जाए तो रक्त क्षत्रियों जैसा है। हाथ में कलम नहीं तलवार है, हिंसा के लिए नहीं रक्षा के लिए। आदिनाथ महाराज ने जब तलवार सौंपी तो कहा था कि रक्षा करना हिंसा नहीं करना। तुम उसी कुल के हो, जिसे आदिनाथ ने तलवार सौंपी थी और रक्षा का भार सौंपा था लेकिन, आप बनियों की संगति में फंस गए, कमजोर हो गए। मेरा बस का नहीं है। अपने आप को क्षत्रिय समझ कर देखो, धर्म ध्यान की वृद्धि हो जाएगी। अशुभ की हानि हो जाएगी। शुभ में चले जाओगे।

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