श्रमण संस्कृति संस्थान सांगानेर जयपुर के विद्वानों द्वारा नगर के बड़े जैन मंदिर में 25 मई से 3 जून तक ग्रीष्मकालीन संस्कार शिक्षण शिविर जारी हैं। जिसमें लगभग 450 शिविरार्थियों ने भाग लिया। 2 जून को शिविरार्थियों की लिखित परीक्षा हुई। मंगलवार 3 जून को परिणाम घोषित कर प्रशस्ति पत्र और पुरस्कार दिए जाएंगे। मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर…
मुरैना। उपदेश उसे ही दिया जाना चाहिए जो समझने की क्षमता रखता है। जिसमें समझने की क्षमता ही नहीं हैं, उसे उपदेश देने से क्या फायदा। जो भी उपदेश है, वह मन वालों के लिए ही है, जिसके पास मन नहीं है उससे कुछ भी कहना नहीं हैं। उपदेश उसे ही सुनाया जाना चाहिए जो सुनने की योग्यता रखता है। क्या आपने किसी को पत्थर को समझाते देखा है ? आपने पत्थर को पूजते तो देखा होगा, लेकिन पत्थर को समझाते नहीं देखा होगा क्योंकि, पत्थर के पास मन नहीं हैं इसलिए उसे समझाया नहीं जा सकता। यह उद्गार दिगम्बर जैन मुनिराजश्री विलोकसागर महाराज ने बड़े जैन मंदिर में शिक्षण शिविर के दौरान शिवरार्थियों को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।
उन्होंने कहा कि जिसके पास मन है, वह लाभ हानि को समझता है। जब भी समझाते हैं, मनुष्य को ही समझाते हैं क्योंकि उसके पास मन है। मनुष्य अच्छे बुरे को समझने की क्षमता रखता है लेकिन, जिसके पास मन नहीं हैं वह अच्छे बुरे का बोध नहीं समझता, जिसे बोध ही नहीं है, उसे समझाने से क्या फायदा क्योंकि, जिसे बोध होगा उसी के अंदर शोध होगा। जिसके अंदर शोध होगा। उसी के अंदर परिवर्तन होगा क्योंकि, वह समझ ही नहीं पा रहा है कि प्रकृति क्या है ? जब तक प्रकृति को नहीं समझोगे तब तक प्रगति नहीं होगी।
3 जून को होगा संस्कार शिक्षण शिविरों का समापन समारोह
दिगंबर जैन संत निर्यापक श्रमण मुनिपुंगव सुधासागर महाराज के आशीर्वाद से मुनिश्री विलोक सागर एवं मुनिश्री विबोधसागर महाराज के पावन सान्निध्य में श्रमण संस्कृति संस्थान सांगानेर जयपुर के विद्वानों द्वारा नगर के बड़े जैन मंदिर में 25 मई से 3 जून तक ग्रीष्मकालीन संस्कार शिक्षण शिविरों का आयोजन किया जा रहा है। जिसमें लगभग 450 शिविरार्थियों ने उत्साह पूर्वक भाग लिया। 2 जून को सभी शिविरार्थियों की लिखित परीक्षा हुई। मंगलवार 3 जून को प्रातः 8 बजे सभी का परिणाम घोषित किया जाकर प्रशस्ति पत्र और पुरस्कार दिए जाएंगे। साथ ही सांगानेर जयपुर से आए हुए विद्वानों का सम्मान भी होगा।
मन से ही अच्छा और मन से ही बुरा होता है
मुनिश्री ने कहा कि तुम्हारा अच्छा और बुरा करने वाला कोई और नहीं हैं, तुम्हारा मन ही है। मन ही तुम्हारा अच्छा और बुरा कार्य है । यदि तुम्हारे पास अच्छा मन होगा तो अच्छे विचारों की उत्पत्ति होगी और सर्वत्र तुम्हारा अच्छा ही अच्छा होगा। बुरे मन वाले के मन में गलत विचारों की उत्पत्ति होगी, वह सर्वत्र बुरा ही बुरा देखेगा । उसे चारों ओर अशांति जी नजर आएगी। बुरे मन वाला यदि भगवान के पास भी बैठा है तब भी उसे भगवान नजर नहीं आयेंगें और अच्छे मन वाला सर्वत्र शांति देखता है। यदि वह शैतान के पास भी बैठा है तो उसे भगवान नजर आएंगे। अपने मन के विचारों की धारा को प्रतिपल पढ़ते रहना चाहिए। बुरे विचारों पर अंकुश लगाना चाहिए। बुरे विचारों में परिवर्तन लाना चाहिए। बुरे विचारों की दशा बदलनी चाहिए। धीरे-धीरे नित्य नियम से मन के विचारों को मोड़ने का अभ्यास करना चाहिए। मन में जब अच्छे विचारों की उत्पत्ति होगी तो आपका जीवन सुखमय हो जाएगा और आप कांटों के बीच भी मुस्करातें हुए सुखी रहना सीख जाएंगे।
सदविचारों से जीवन होगा सुखमय
मुनिश्री ने कहा कि मन को सदविचारों में लगाने से परिवार में शांति रहेगी, साथ ही आपका स्वयं का जीवन भी सुखमय हो जाएगा। शांतिपूर्वक सुखमय जीवन निर्वहन करने के लिए आप सभी को छः बातों का विशेष ध्यान रखना होगा। अहंकार का त्याग करना होगा, ममकार को भूलना होगा, आशक्ति शून्य करनी होगी। इसी प्रकार अधिकार शून्य हो जाइए, कर्तव्य भूल जाइए, अलंकार को त्याग दीजिए। इन छः सूत्रों पर पारिवारिक जीवन निर्भर रहता है। आप उम्र के अंतिम पड़ाव से गुजर रहे हैं। इन छः सूत्रों पर अमल करिए, आपका स्वयं का जीवन सुखमय होगा ही आपके परिवार में भी सुख शांति बनी रहेगी।













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