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भगवान शांतिनाथ जी का जन्म तप और मोक्ष कल्याणक 26 मई को : तिथि के अनुसार तीनों कल्याणक ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्दशी को मनाया जाएगा 


जैन धर्म के 16वें तीर्थंकर भगवान शांतिनाथ जी का जन्म, तप और मोक्ष कल्याण 26 मई को मनाया जाएगा। तिथि अनुसार यह शुभ अवसर ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्दशी को आ रहा है। इस पुण्य मौके पर दिगंबर जैन मंदिरों में अभिषेक, शांतिधारा, पूजा-पाठ और आराधना का दौर रहेगा। श्रीफल जैन न्यूज की ओर से विशेष कड़ी में आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित प्रस्तुति…


इंदौर। जैन धर्म के 16वें तीर्थंकर भगवान शांतिनाथ का जन्म, तप और मोक्ष कल्याणक एक ही दिन ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्दशी को हुआ आता है। जैन धर्म ग्रंथों के अनुसार जन्म हस्तिनापुर में हुआ था, उनके पिता राजा विश्वसेन और माता महारानी ऐरा थीं। वैराग्य आने पर उन्होंने हस्तिनापुर में ही दीक्षा ली। जिसे तप कल्याणक कहा जाता है। उन्होंने सम्मेदशिखर पर्वत पर तपस्या की और वहीं मोक्ष को प्राप्त हुए। भगवान शांतिनाथ के जन्म, तप और मोक्ष कल्याणक इस वर्ष 26 मई को आ रहा है। यहां यह उल्लेखनीय है कि बचपन से ही भगवान शांतिनाथ कामदेव के सामन सुंदर थे। उनका मनोहारी रूप देखने के लिए देवराज इंद्र, इंद्राणी उपस्थित हुए थे। भगवान शांतिनाथ के शरीर की आभा स्वर्ण के समान थी। उनके शरीर पर सूर्य, चंद्र, ध्वजा, शंख, चक्र और तोरण के शुभ मंगल चिन्ह थे। जन्म से ही उनकी चिह्वा पर मां सरस्वती विराजित थीं। जब भगवान शांतिनाथ युवावस्था में पहुंचे तो राजा विश्वसेन ने उनका विवाह करवाया एवं स्वयं मुनि दीक्षा ले ली। राजा बने शांतिनाथ के शरीर पर जन्म से ही शुभ चिन्ह थे। इस कारण वे शीध्र चक्रवर्ती राजा बन गए।

भगवान शांतिनाथ ने सैकड़ों वर्षों तक न्यायपूर्वक किया शासन 

भगवान शांतिनाथ जी की 96 हजार रानियां थीं। उनके पास 84 लाख हाथी, 360 रसोइए, 84 करोड सैनिक, 28 हजार वन, 18 हजार मंडलिक राज्य, 360 राजवैद्य, 32 हजार अंगरक्षक देव,32 चंवर ढुलाने वाले, 32 हजार मुकुटबंध राजा, 32 हजार सेवक देव, 16 हजार खेत, 56 हजार अंतर्दीप, 4 हजार मठ, 32 हजार देश, 96 करोड़ ग्राम, 1 करोड़ हंडे, 3 करोड़ गायें, 3 करोड़ 50 लाख बंधु-बांधव, 10 प्रकार के दिव्य भोग, 9 निधियां और 24 रत्न, 3 करोड़ थालियां आदि अकूत संपदा थी। इस अकूत संपदा के मालिक शांतिनाथ ने सैकड़ों वर्षों तक पूरी पृथ्वी पर न्यायपूर्वक शासन किया।

सोलह वर्षों तक घोर तप किया

एक दिन वे दर्पण में अपना मुख देख रहे थे तभी उनकी किशोरावस्था का एक और मुख दिखाई दिया। मानों वह उन्हें कुछ संकेत कर रहा था। उस संकेत को देख वे समझ गए कि वे पहले किशोर थे फिर युवा हुए और अब प्रौढ़। इसी प्रकार सारा जीवन बीत जाएगा, लेकिन उन्हें इस जीवन मरण के चक्र से छुटकारा पाना है। यही उनके जीवन का उद्देश्य भी है। और उसी पल उन्होंने अपने पुत्र नारायण का राज्याभिषेक किया और स्वयं दीक्षा लेकर दिगंबर मुनि बन गए। मुनि बनने के बाद लगातार सोलह वर्षों तक विभिन्न वनों में रहकर घोर तप किया और पौष शुक्ल दशमी को उन्हें केवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई और वे तीर्थंकर कहलाए। तदंतर उन्होंने लगातार विहार कर लोक कल्याण किया, उपदेश दिए। ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्दशी के दिन सम्मेद शिखर जी पर भगवान शांतिनाथ को निर्वाण प्राप्त हुआ।

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