गणाचार्य विराग सागर जी के शिष्य आचार्य श्री विभव सागर जी महाराज के शिष्य मुनि श्री प्रक्षाल सागर जी एवं मुनि श्री रत्नत्रय सागर जी का मंगलवार को प्रातः गणपुर धार से बड़वानी नगर में मंगल प्रवेश हुआ। मुनि संघ इंदौर में पट्टाचार्य कार्यक्रम में शामिल होकर तीर्थ क्षेत्र की वंदना के निमित्त पदयात्रा कर गुजरी, धामनोद, धरमपुरी, सिंघाना होते हुए नगर में पधारे। समाज के युवा संघ उनके साथ पद विहार में साथ रहे। समाजजनों ने अगवानी की। बड़वानी से दीपक प्रधान की यह खबर…
बड़वानी। नगर में गणाचार्य विराग सागर जी के शिष्य आचार्य श्री विभव सागर जी महाराज के शिष्य मुनि श्री प्रक्षाल सागर जी एवं मुनि श्री रत्नत्रय सागर जी का मंगलवार को प्रातः गणपुर धार से बड़वानी नगर में मंगल प्रवेश हुआ। मुनि संघ इंदौर में पट्टाचार्य कार्यक्रम में शामिल होकर तीर्थ क्षेत्र की वंदना के निमित्त पदयात्रा कर गुजरी, धामनोद, धरमपुरी, सिंघाना होते हुए नगर में पधारे। समाज के युवा संघ उनके साथ पद विहार में साथ रहे। प्रातः बड़वानी आगमन पर समाज के लोगों ने मुनि द्वय की पाद प्रक्षालन कर आरती उतार कर मंगल अगवानी की। यहां ये उल्लेखनीय है कि मुनि श्री रत्नत्रय सागर जी की मुनि दीक्षा दो वर्ष पूर्व आचार्य श्री विभव सागर जी के हाथों से बावनगजा सिद्ध क्षेत्र पर हुई थी।
हमारे जीवन के कर्ता-धर्ता हम स्वयं हैं।
मुनि संघ ने बड़वानी मंदिर में विराजित भगवान के दर्शन किए और मुनि श्री रत्नत्रय सागर जी ने धर्म सभा को संबोधित किया और कहा कि हम हमारे जीवन के कर्ता-धर्ता हम स्वयं हैं। याने हमारे कर्म के अनुसार हमे कर्म का फल प्राप्त होता है, जैन कर्म सिद्धांत बताता है कि हमारा कर्ता कोई नहीं है, ना हमारे माता-पिता, ना ही हमारे प्रिय भगवान आदिनाथ, भगवान भी हमारे कर्ता-धर्ता नहीं है। यदि भगवान हमारे कर्ता-धर्ता होते तो कोई गरीब नहीं होता। कोई तकलीफ नहीं पता भगवान सभी को प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, उद्योग पति, करोड़ पति बना देता, याने भगवान हमारे कर्ता-धर्ता नहीं है। जैन धर्म कर्म सिद्धांत कहता है कि आपको किए गए कर्म के अनुसार ही आपको फल मिलता है। कर्मों ने भगवान तीर्थंकर आदिनाथ, पार्श्वनाथ, महावीर भगवान को और आचार्य को नहीं छोड़ा अतः भगवान कर्मों के कर्ता-धर्ता नहीं हैं। हम स्वयं है। मुनि महाराज ने राजा श्रेणिक, रानी चेलना यशोधर मुनि का दृष्टांत देते हुए बताया कि कैसे राजा श्रेणिक ने जंगल में कठोर तपस्या करते हुए मुनि राज पर मरा हुआ सांप डाल दिया था और जब रानी चेलना को बताया और जाकर देखा महाराज के गले में सांप के आसपास चींटियां चल रही थी और मुनिराज एकाग्र चित होकर बगैर विचलित हुए तपस्या ने लीन थे और उनके शरीर से खून बह रहा था। तब रानी ने राजा को कहा कि तुमने कैसा नर्क का बंध कर लिया और ये पाप किया और रानी चेलना ने मरे हुए सर्प को हटा कर उपसर्ग दूर किया और मुनिराज ने फिर भी दोनों को आशीर्वाद दिया और वो मरा हुआ सर्प माला में बदल गया। इस अवसर पर समाज के युवा बच्चे महिला उपस्थित थे। धर्म सभा के पश्चात मुनिसंघ की आहार चर्या हुई,शाम को मुनि संघ का विहार बावनगजा सिद्ध क्षेत्र की ओर हुआ। यह जानकारी मनीष जैन ने दी।













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