दोहों का रहस्य समाचार

दोहों का रहस्य -110 आत्मबोध से पा सकते हैं ईश्वर : अपने भीतर के अंधकार और दुर्बलताओं को स्वीकार करें


दोहे भारतीय साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा हैं, जो संक्षिप्त और सटीक रूप में गहरी बातें कहने के लिए प्रसिद्ध हैं। दोहे में केवल दो पंक्तियां होती हैं, लेकिन इन पंक्तियों में निहित अर्थ और संदेश अत्यंत गहरे होते हैं। एक दोहा छोटा सा होता है, लेकिन उसमें जीवन की बड़ी-बड़ी बातें समाहित होती हैं। यह संक्षिप्तता के साथ गहरे विचारों को व्यक्त करने का एक अद्भुत तरीका है। दोहों का रहस्य कॉलम की 110वीं कड़ी में पढ़ें मंजू अजमेरा का लेख…


मैं अपराधी जन्म का, नख सिख भरा विकार।

तुम दाता दुख भंजन, मेरी करो संहार॥


इस दोहे में कबीरदास जी आत्मस्वरूप की गहराई में उतरते हुए पूर्ण आत्मसमर्पण की अवस्था को व्यक्त करते हैं। वे कहते हैं, “मैं जन्म से ही अपराधी हूँ” — अर्थात यह मनुष्य शरीर और उसका चित्त जन्मजात ही माया, मोह, काम, क्रोध, लोभ और अहंकार जैसे विकारों से युक्त है। “नख सिख” — यानी नाखून से लेकर सिर तक — संपूर्णता का प्रतीक है, जिससे आशय है कि शरीर, मन, विचार और व्यवहार — सब दूषित हैं।

 

यह केवल आत्मग्लानि नहीं, बल्कि गहन आत्मबोध है, जहां व्यक्ति अपने वास्तविक स्वरूप की सीमाओं, दोषों और अंधकार का निर्भीक साक्षात्कार करता है। कबीरदास यह नहीं कहते कि “मुझसे गलती हो गई”, बल्कि कहते हैं — “मैं स्वयं ही दोष हूं”, “मेरा अस्तित्व ही विकृत है”। यह भाव अत्यंत विनम्र, पारदर्शी और निर्मल आत्मनिरीक्षण का उदाहरण है।

 

जब कोई अपने भीतर के अंधकार और दुर्बलताओं को स्वीकार करता है, और यह अनुभव करता है कि “मैं कुछ नहीं, सब कुछ तू है”, तभी वह ईश्वर की कृपा का पात्र बनता है। ‘स्व’ के मिटने से ही ‘परमात्मा’ का उदय संभव होता है।

 

यह दोहा आत्मा की उस अवस्था को दर्शाता है जहाँ वह स्वयं को पूर्णतः दोषी, अधम और अशुद्ध मानती है — और उसी क्षण वह ईश्वर से प्रार्थना करती है कि वह उसके झूठे ‘मैं’ का संहार कर दे, जिससे उसके भीतर ‘सत्य आत्मा’ का प्रकाश हो सके।

 

अतः यह दोहा भक्त और भगवान के बीच के उस गहन क्षण को उद्घाटित करता है, जब आत्मा अपने समस्त दोषों को स्वीकार कर पूर्ण समर्पण की स्थिति में ईश्वर से एकात्म होने की प्रार्थना करती है। यह केवल एक प्रार्थना नहीं, बल्कि आत्मा की ‘मैं’ से मुक्ति और ‘तू’ में विलय की याचना है। यही भक्ति का शिखर, ज्ञान का सार और मुक्ति का द्वार है।

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