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आचार्य श्री विशुद्धसागरजी महाराज का पट्टाचार्य महोत्सव पर विशेष: बचपन से ही दिख रहे थे संयम मार्ग और वैराग्य के लक्षण


आचार्य श्री विरागसागरजी महाराज शिष्य आचार्य श्री विशुद्धसागरजी महाराज का पट्टाचार्य महोत्सव इंदौर में होने जा रहा है। यहां 27 अप्रैल से महोत्सव की शुरूआत होगी। आचार्यश्री के बारे में आइए जानते हैं कुछ महत्वपूर्ण जानकारियां। इंदौर से पढ़िए अभिषेक पाटील की यह खबर…


इंदौर। आचार्य श्री विरागसागरजी महाराज के शिष्य आचार्य श्री विशुद्धसागरजी महाराज का पट्टाचार्य महोत्सव इंदौर में होने जा रहा है। यहां 27 अप्रैल से महोत्सव की शुरूआत होगी। आचार्यश्री के बारे में आइए जानते हैं कुछ महत्वपूर्ण जानकारियां। देश की पावन वसुंधरा को अनेकों ऋषि मुिनयों ने अपनी चरण धुलि से पवित्र किया है और समाज को एक नई दिशा प्रदान की है। इसी श्रृंखला में इक्कीसवीं सदी के एक दूरदृष्टा, युवाओं के प्रेरणा पुंज, आगमनुसार आचरण कर जन-जन को सद्बोध देने वाले आचार्य श्री विशुद्धसागरजी महाराज वर्तमान में अपनी धर्म प्रभावना के साथ समाज के समक्ष उपस्थित हैं। सत्य, अहिंसा, मैत्री, जियो और जिने दो के साथ आचार्य विरागसागर जी के शिष्य आचार्य श्री विशुद्धसागर जी का मुख्य नारा नमोस्तु शासन जयवंत हो है।

आचार्य श्री विशुद्धसागर जी का जन्म मध्यप्रदेश के भिंड में 18 दिसंबर 1971 को हुआ। आपका गृहग्राम रूर है। जहां आपकी प्राथमिक शिक्षा दसवीं तक हुई थी। आपके पिता रामनारायण ( समाधिस्थ मुनि श्री विश्वजीत सागर जी ) एवं माता रत्तीबाईजी जैन ( समाधिस्थ क्षुल्लिका श्री विश्वमति माताजी ) थीं। जिन्होंने दीक्षा लेकर देवलोक गमन किया। आपके पांच भाई और दो बहन हैं। श्रमणाचार्य श्री विशुद्धसागरजी महाराज यथा नाम तथा गुण रुप हैं।

राजेंद्र (लला)जैन से पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागरजी तक का सफर 

राजेंद्र (आचार्य श्री विशुद्धसागर महाराज जी का बचपन का नाम ) की बचपन से प्रारंभिक क्रियाएं उनके भविष्य में वैराग्य की ओर बढ़ते कदमों का संकेत दे रही थी। उनका विवरण इस प्रकार है।

 बचपन से ही जिनालय जाना   

राजेंद्र (लला) अल्पायु से अपने पिताजी रामनारायणएवं माता रत्तीबाई एवं अपने अग्रजों के साथ प्रतिदिन श्री जिन मंदिर दर्शनों के लिये जाने लगे थे।

रात्रि भोजन एवं अभक्ष्य वस्तुओं का त्याग

राजेंद्र ने 7वर्ष की अल्पायु में श्री जिनालय में रात्रि भोजन का त्याग एवं अभक्ष्य वस्तुओं के त्याग का नियम ले लिया था और उसका पालन पालन करना प्रारंभ कर दिया था।

सप्त व्यसनों का त्याग एवं अष्ट मूल गुणों का पालन

राजेंद्र (लला )जब 8 वर्ष के थे, तभी से उन्होंने सप्त व्यसन का त्याग एवं अष्ट मूल गुणों का पालन करना प्रारंभ कर दिया था।

बिना देव दर्शन भोजन न करने का नियम

राजेंद्र ने 13 वर्ष की अल्पायु में तीर्थराज श्री दिगंबर जैन सिद्ध क्षेत्र शिखरजी में बिना देव दर्शन के भोजन न करने का नियम ले लिया था।

स्वतः ब्रहमचर्य व्रत अंगीकार 

अल्पायु में राजेंद्र ने अपने ग्राम रुर के जिनालय में भगवान् के समीप स्वयं ही ब्रह्मचर्य व्रत ले लिया था।

अनेक तीर्थ क्षेत्र की वंदना करने का सौभाग्य

राजेंद्र (लला)ने अपने पिताजी, माताजी एवं अनेक परिवार जनों के साथ बचपन से ही सम्मेद शिखरजी, सोनागिरी जी एवं अनेक तीर्थ क्षेत्र के दर्शन करने एवं वहां विराजमान महाराजों के दर्शन करना भी उनके वैराग्य का एक बिंदु है।

  बहन ने पूछा राजेंद्र खेलता क्यों नहीं?

बहन ने एक दिन पूछा था कि राजेंद्र खेलता क्यों नहीं? तब राजेंद्र बोले- दीदी मेरा मन है कि दिगंबर मुनि बनूं। यदि खेलते समय मेरा अंग-भंग न हो जाए। कहीं इसलिए मैं नहीं खेलता। अगर मेरा अंग भंग होगा तो मैं दीक्षा कैसे ग्रहण करुंगा? मुझे आपकी अदम्य क्षमता और समता देखकर भ्रम सा उत्पन्न हो जाता है कि आप विक्रियाधारी देव हैं या धरती के मानव?

क्षुल्लक दीक्षा

राजेंद्र (लला) ने आचार्य विराग सागर महाराज जी के कर कमलों से 11 अक्टूबर 1988 को भिंड में क्षुल्लक दीक्षा ग्रहण की। उनका नाम रखा गया। क्षुल्लक श्री यशोधर सागर जी। इस समय इनकी आयु 18 वर्ष की थी।

ऐलक दीक्षा

क्षुल्लक श्री यशोधर सागर जी ने आचार्य विराग सागर महाराज जी के कर कमलो से 2 वर्ष बाद 19 जून 1991 को ऐलक दीक्षा पन्नानगर में ग्रहण की।

मुनि दीक्षा

एलक दीक्षा के 6 माह बाद ही एलक श्री यशोधर सागर महाराज जी ने 20 वर्ष की आयु में अपने गुरुवर आचार्य श्री विराग सागर महाराज से श्रेयांस गिरी में दिनांक 21 नवंबर 1991 को मुनि दीक्षा ग्रहण की और नाम रखा गया मुनि श्री 108 विशुद्धसागर जी महाराज।

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