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साधु का महत्व वैभव से नहीं वीतरागता से -उपाध्यक्ष श्री विश्रुत सागर: श्रद्धालुओं ने प्रवचन में जाना नमस्कार का महत्व


छत्रपति नगर के दिगंबर जैन आदिनाथ जिनालय में उपाध्याय श्री विश्रुत सागर जी ने सोमवार को धर्मसभा संबोधित की। साथ ही मुनिश्री निर्वेद सागर जी महाराज ने भी संयम और संस्कार के बारे में बताया। कार्यक्रम में पाद प्रक्षालन और शास्त्र भेंट किए गए। इंदौर से पढ़िए राजेश जैन दद्दू की यह खबर…


इंदौर। वर्तमान में लोग साधुओं को पंथों, ग्रंथों और जातियों में बांटकर और पंथ की आड़ लेकर साधुओं को बदनाम कर रहे हैं। आज साधु भी साधु के प्रति लोगों में अश्रद्धा का भाव उत्पन्न करा रहे हैं। साधु का महत्व वैभव से नहीं वीतरागता से है। यह उद्गार आज दिगंबर जैन आदिनाथ जिनालय छत्रपति नगर में उपाध्यक्ष श्री विश्रुत सागर जी महाराज ने प्रवचन देते हुए व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि सम्यक दृष्टि बनना है तो आगम की सुनो और देव शास्त्र गुरु पर समीचीन श्रद्धा रखो, जो जीव आगम की नहीं माने वह मिथ्या दृष्टि है। आपने कहा कि जब प्रतिमा को नमस्कार कर सकते हो तो अरिहंत की मुद्रा को भी नमस्कार करें।

संयम एवं संस्कार से आती है गुणवत्ता 

इस अवसर पर मुनि श्री निर्वेद सागर जी महाराज ने भी धर्म सभा में प्रवचन देते हुए कहा कि बच्चों को बचपन से ही संयम और संस्कार का महत्व बताएं और उनमें संस्कार डालें। संयम एवं संस्कार से व्यक्ति के जीवन में गुणवत्ता बढ़ती है और नर से नारायण बनने का मार्ग प्रशस्त होता है। उपाध्यक्ष श्री के पाद प्रक्षालन राकेश जैन एवं आलोक जैन ने किये एवं सुशीला जैन, सोनाली बागड़िया एवं मनीषा जैन ने उपाध्यक्ष श्री को शास्त्र भेंट किये। संचालन डॉ. जैनेंद्र जैन ने किया।

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