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प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ का जन्म और तप कल्याणक: तिथि के अनुसार चैत्र कृष्ण नवमीं के दिन आता है। इस बार यह 23 मार्च को 


जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर का 23 मार्च को जन्म और तप कल्याणक 23 मार्च को मनाया जाएगा। पूरे देश के दिगंबर जैन मंदिरों, सिद्ध क्षेत्र और अतिशय क्षेत्र में बड़ी धूमधाम रहेगी। भगवान आदिनाथ के जन्म और तप कल्याणक को लेकर दिगंबर जैन समाज के लोगों में धार्मिक उल्लास बना हुआ है। भगवान श्री आदिनाथ का अभिषेक, शांतिधारा, अष्टद्रव्य आदि से पूजन विधान आदि किया जाएगा। उनका जन्म और तप कल्याणक चैत्र कृष्ण नवमी के दिन मनाया जाता है। श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रंखला में उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह प्रस्तुति पढ़िए…


इंदौर। जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर का 23 मार्च को जन्म और तप कल्याणक 23 मार्च को मनाया जाएगा। पूरे देश के दिगंबर जैन मंदिरों, सिद्ध क्षेत्र और अतिशय क्षेत्र में बड़ी धूमधाम रहेगी। इस दिन भगवान श्री आदिनाथ का अभिषेक, शांतिधारा, अष्टद्रव्य आदि से पूजन विधान आदि किया जाएगा। श्रद्धालुओं की ओर से भक्ति भाव से आराधना का दौर रहेगा। भगवान आदिनाथ जी का जन्म और तप कल्याणक चैत्र कृष्ण नवमी के दिन मनाया जाता है। इस बार यह 23 मार्च को आ रहा है। जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ का जन्म चैत्र कृष्ण नवमी के दिन सूर्याेदय के समय हुआ। उन्हें ऋषभनाथ भी कहा जाता है। उन्हें जन्म से ही संपूर्ण शास्त्रों का ज्ञान था। वे समस्त कलाओं के ज्ञाता और सरस्वती के स्वामी थे। युवा होने पर कच्छ और महा कच्छ की दो बहनों यशस्वती (या नंदा) और सुनंदा से ऋषभनाथ का विवाह हुआ। नंदा ने भरत को जन्म दिया, जो आगे चलकर चक्रवर्ती सम्राट बने। भगवान ऋषभनाथ ने ही विवाह-संस्था की शुरुआत की और प्रजा को पहले-पहले असि (सैनिक कार्य), मसि (लेखन कार्य), कृषि (खेती), विद्या, शिल्प (विविध वस्तुओं का निर्माण) और वाणिज्य-व्यापार के लिए प्रेरित किया। उनका सूत्र वाक्य था- ‘कृषि करो या ऋषि बनो।’

गन्ने का रस पीकर अपना उपवास तोड़ते हैं

आदिनाथ जी ऋषभनाथ ने हजारों वर्षों तक सुखपूर्वक राज किया। फिर राज्य को अपने पुत्रों में विभाजित कर दिगंबर तपस्वी बन गए। उनके साथ सैकड़ों लोगों ने भी उनका अनुसरण किया। जैन मान्यता है कि पूर्णता प्राप्त करने से पूर्व तक तीर्थंकर मौन रहते हैं। अतः आदिनाथ को एक वर्ष तक भूखे रहना पड़ा। इसके बाद वे अपने पौत्र श्रेयांश के राज्य हस्तिनापुर पहुंचे। श्रेयांस ने उन्हें गन्ने का रस भेंट किया, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। वह दिन आज भी ‘अक्षय तृतीया’ के नाम से प्रसिद्ध है। हस्तिनापुर में आज भी जैन धर्मावलंबी इस दिन गन्ने का रस पीकर अपना उपवास तोड़ते हैं। इस प्रकार एक हजार वर्ष तक कठोर तप करके ऋषभनाथ को कैवल्य ज्ञान (भूत, भविष्य और वर्तमान का संपूर्ण ज्ञान) प्राप्त हुआ। वे जिनेंद्र बन गए।

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