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दोहों का रहस्य -36 सच्ची सफलता केवल भौतिक धन में नहीं, बल्कि अच्छे कर्मों और समाज सेवा में : निस्वार्थ होकर कर्म करें, लालच न करें


दोहे भारतीय साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा हैं, जो संक्षिप्त और सटीक रूप में गहरी बातें कहने के लिए प्रसिद्ध हैं। दोहे में केवल दो पंक्तियां होती हैं, लेकिन इन पंक्तियों में निहित अर्थ और संदेश अत्यंत गहरे होते हैं। एक दोहा छोटा सा होता है, लेकिन उसमें जीवन की बड़ी-बड़ी बातें समाहित होती हैं। यह संक्षिप्तता के साथ गहरे विचारों को व्यक्त करने का एक अद्भुत तरीका है। दोहों का रहस्य कॉलम की छत्तीसवीं कड़ी में पढ़ें मंजू अजमेरा का लेख…


माया छाया एक सी, बिरला जाने कोय।
भगता के पीछे लगे, सम्मुख भागे सोय।

कबीर दास जी इस दोहे में माया (भौतिक संसार) और छाया (परछाई) की समानता को बताते हुए हमें एक महत्वपूर्ण जीवन शिक्षा दे रहे हैं।
माया (धन, संपत्ति, भौतिक सुख) को लोग सच्चा मानकर उसके पीछे भागते हैं, लेकिन यह बिल्कुल छाया की तरह होती है—जब हम इसके पीछे दौड़ते हैं, तो यह और दूर जाती है।
यदि हम माया से दूर रहना चाहें (संतोष रखें), तो यह स्वतः ही हमारे पास आती है, जैसे सूरज की दिशा में चलते समय छाया आगे भागती है, और पीछे चलने पर छाया पीछे आती है।
इसका व्यावहारिक संदेश यह है कि धन और सांसारिक सुखों के लिए अति लालच करने से वे दूर होते जाते हैं, लेकिन अगर हम निस्वार्थ होकर कर्म करें और लोभ से बचें, तो सुख स्वतः मिलता है।
कबीर दास जी यहां यह समझा रहे हैं कि जो व्यक्ति सांसारिक मोह (माया) के पीछे दौड़ता है, वह इसे कभी नहीं पा सकता, लेकिन जो इसे त्यागकर ईश्वर-भक्ति में लीन हो जाता है, उसे सांसारिक और आध्यात्मिक दोनों सुख स्वतः मिल जाते हैं।
समाज में अधिकतर लोग धन, प्रतिष्ठा, और भौतिक सुखों के पीछे भागते हैं, लेकिन वे कभी पूरी तरह संतुष्ट नहीं हो पाते।
वहीं, जो व्यक्ति परोपकार, सच्चाई और नैतिकता के साथ जीवन जीता है, उसे समाज में सम्मान और सफलता दोनों मिलती हैं।
अतः सच्ची सफलता केवल भौतिक धन में नहीं, बल्कि अच्छे कर्मों और समाज सेवा में है।

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