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Life Management-4 पुत्री कही जाती है ‘उभयकुलवर्धिनी‘ : कुल की मर्यादा का पालन करने वाली स्त्री ही सुखी


सूत्र वाक्य छोटे होते हैं लेकिन उनका निर्माण बडे़ अनुभवों के आधार पर होता है। महापुरुषों ने जो कुछ भी कहा, सूत्रात्मक ही कहा। सूत्र वाक्य ही सूक्तियां कहलाती हैं। चिन्तन से सूत्रों का अर्थ खुलता है। धर्म के अन्तिम संचालक, तीर्थ के प्रवर्तक, चौबीसवें तीर्थंकर भगवान् महावीर स्वामी हुए हैं। यद्यपि वह मुख्यतया आत्मज्ञ थे, अपने निजानन्द में लीन रहते थे, फिर भी वह सर्वज्ञ थे। मुनि श्री प्रणम्य सागर जी महाराज की पुस्तक खोजो मत पाओ व अन्य ग्रंथों के माध्यम से श्रीफल जैन न्यूज लाइफ मैनेजमेंट नाम से नया कॉलम शुरू कर रहा है। इसके चौथे भाग में पढ़ें श्रीफल जैन न्यूज के रिपोर्टर संजय एम तराणेकर की विशेष रिपोर्ट….


चौथा सूत्र

चेटिंग से चीटिंग तक भारतीय नारी

आज की नारी को पुरूषों के समकक्ष दर्जा
नारी को पुरुषों के समकक्ष दर्जा दिया जाने लगा है। साथ ही वह अपना हक हासिल करने में भी सक्षम हैं। अपितु उसका समाज में योगदान भी अविस्मरणीय होता हो रहा है। वे आज की नारी है जो पुरुषों से कदम से कदम मिलाकर चल रही हैं। नारी की पुरुषों से कम नहीं वाली सोच ही भावनात्मक विद्रोह का रूप लेकर उसे इंटरनेट, मोबाइल, फेसबुक और नशे की चीजों से जोड़कर उसके जीवन को तबाह कर रही है।

भारतीय नारी को देवी का रूप माना जाता है
भारतीय नारी का एक ही पति होता है। उसका पति ही उसके लिए सब कुछ होता है। पति ही मित्र है, पति ही प्राणनाथ है, पति ही रक्षक है और पति ही परमेश्वर है, ऐसी भारतीय नारी की पवित्र मानसिकता रहती है। इसी कारण से नारी को भारत में देवी का रूप माना जाता है। जब कन्या एक घर से दूसरे घर में विवाहित होकर जाती है तो वह साक्षात् लक्ष्मी का रूप होती है।

नारी ‘उभयकुलवर्धिनी‘ हैं
पुत्र को ‘कुल दीपक‘ कहा जाता है। वह एक कुल का ही दीपक है किन्तु पुत्री ‘उभयकुलवर्धिनी‘ कही जाती है। वह पीहर और ससुराल दोनों पक्षों को बढ़ाने वाली होती है। इसी कारण नारी का स्थान सर्वोच्च है। इसीलिए भारतीय संस्कृति में कहा गया है-‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता‘ अर्थात् जहाँ नारी की पूजा की जाती है वहाँ देवता निवास करते हैं। आज भी प्रत्यक्ष अनुभव किया जाता है कि जिस घर में सुशिक्षित, उदार विचार वाली, सज्जन, सुशील, सच्चरित्रवान् स्त्री रहती है उस घर में, परिवार में सुख-शान्ति निरन्तर बनी रहती है।

शिक्षित और सुशील नारी आज भी सुखी है
भले ही आज की शिक्षा कैसी भी हो, भले ही आज का वातावरण कैसा भी हो, दुनिया में कितना ही ग्लैमर क्यों न हो, स्त्री पुरुषों की होड़ में आगे हो या न हो पर इतना निश्चित है जो बेटी, बहु शिक्षित और सुशील है वह आज भी सुखी है। अनेक अभावों और प्रतिकूल माहौल में भी वह स्त्री उन स्त्रियों से ज्यादा निश्चिन्त, निरोग और सुखी रहती है, जो स्त्रियां कुल की मान-मर्यादा को किनारे रखकर अपनी संस्कृति और सभ्यता का उल्लंघन कर जीवन जीती हैं।

नारी पहले भी देवी थी, आज भी है,
यदि वह अपने आप में महसूस करे तो।

अनचाहे सम्बन्धी को मित्र बनाने की होड़़
यार यानी जाली दोस्त। इन दोस्तों और अनचाहे सम्बन्धी को मित्र बनाने की होड़ में नारी अपने देवत्व को स्वयं नष्ट कर रही है। आज पढ़ने वाली लड़कियों में यही स्पर्धा है कि किसके कितने मित्र हैं? किसके कितने चाहने वाले हैं ? यह स्पर्धा ही नारी के शील को नष्ट कर रही है। जिस यौवन की पहले नारी रक्षा करती थी आज वह उस यौवन के नशे में अपना शील बेचने के लिए मौके तलाशती है। पहले नारी के लिए सम्मानसूचक शब्द जैसे पतिव्रता, स्त्री, महिला, बेटी, पुत्री, लक्ष्मी, सरस्वती, लाजवन्ती, कुलवधू प्रयोग किए जाते थे। आज नारी के लिए डार्लिंग (Darling),कॉल गर्ल, (Call Girl), सेक्सी (Sexy) जैसे शब्द प्रयोग होते हैं और मजे की बात यह है कि इन शब्दों को सुनकर नारी को अपमान महसूस नहीं होता अपितु वे खुश होती है। अपने को मॉडर्न और हाई स्टेटस का समझती है। यह अज्ञानता ही महाविनाश का यह कारण है।

झूठ से प्रारंभ फेसबुक वाले संबंध
इस अज्ञानता का सबसे बड़ा माध्यम है-फेसबुक (Facebook)। फेसबुक का यह दावा है कि वह नये संबंध बनाता है और लोगों को आपस में जोड़ता है, एकदम गलत और हास्यास्पद है। नित नयी घटनाओं से यह सच्चाई सामने आ रही है कि फेसबुक से जो संबंध बनाये जाते हैं, वे झूठ से शुरू होते हैं और अलगाव पर समाप्त हो जाते हैं। इस एकाउन्ट (Account) को रखने वाले यूजर जब अपनी फेसबुक प्रोफाइल बनाते है तो एकदम गलत डाटा फीड करते है। 40 साल का आदमी अपने को 22 साल का लिखता है। बेरोजगार आदमी बांबे की नामी-गिरामी कम्पनी में जॉब दिखाता है। चार-चार बच्चों का बाप अपने आपको अविवाहित लिखता है। मैं किसी घटना को दिखाकर इस तथ्य को पुष्ट करने की कोशिश नहीं करना चाहता हूँ क्योंकि यह जगजाहिर तथ्य है। एक लड़का और एक लड़की फेसबुक के जरिए लम्बे समय तक बात करते रहें जब वे दोनों मिले तो भाई-बहिन निकले। पहले चेटिंग (बातचीत) फिर डेटिंग (तारीखों पर मिलना) फिर (विवाह की तैयारी) और अन्त में चीटिंग (धोखा खा जाना) यही इस फेसबुक की असलियत है।

अहित कर रहा क्षणिक आनन्द
क्षणिक आनन्द और घटिया मनोरंजन के लिए इस फेसबुक से जुड़ने वाली भोली या अप्रौढ़ बेटियां अपना अहित करने को मजबूर हो रही हैं जैसे एक मक्खी यह जानकर के भी कि उसके पैर सीरा (चाशनी) में फंस जायेंगे और उसे अन्ततः मरना पड़ेगा, वह उस सीरे में गिर जाती है। इस नादानी से कौन बचाये ? कौन समझाये ?

लड़कियों की स्वच्छंदता
आज 15-16 वर्ष के छात्र/छात्रा को शराब, सिगरेट से परहेज नहीं है। शिक्षा की स्वतन्त्रता ने इतना स्वच्छन्द बना दिया है कि अब पाप, पाप जैसा नहीं लगता है। 11-12 वर्ष की लड़कियों के हॉस्टल में (शहरी स्कूलों में) ब्यूटीशियन को बुलाकर (Manicure, Padicure, Facial) आदि इसलिए कराया जाता है कि उन्हें सुंदर दिखाया जा सके ताकि उनके अंदर हीन भावना न आ जाए कि लड़के हमें पसंद नहीं कर रहे हैं। उन्हें छोटे-छोटे पतले स्कर्ट और कसे हुए जीन्स पहनाये जाते हैं।

नारी अपनी गुणवत्ता बनाए रखे
नारी कहती है कि मैं पुरुषों से कम नहीं हूँ। उसकी यह सोच ही गलत है। यह सोच ही भावनात्मक विद्रोह का रूप लेकर उसे इंटरनेट, मोबाइल, फेसबुक और नशे की चीजों से जोड़कर उसके जीवन को तबाह कर रही है। वस्तुतः प्रत्येक नारी को यह सोचना चाहिये कि मैं दोनों कुल (पीहर और ससुराल) को प्रकाशमान करने वाली जन्मजात मशाल हूँ। जो प्रेम, करुणा, सहृदयता, शालीनता, लज्जा, सुशीलता जैसे भावनात्मक गुण नारी में हैं वे गुण कभी पुरुष में आ ही नहीं सकते फिर वह पुरुष से पीछे रह कैसे सकती है, बशर्ते कि वह अपनी गुणवत्ता बनाए रखे।
आज की नारी की गुणवत्ता विज्ञापनों में छा जाना, कई मित्र बनाना, सेक्सी दिखना इन दुर्गुणों में बदल रही है जो धीरे-धीरे वेश्यावृत्ति (Prostitution) के नये और बदले रूप हैं। इस सन्दर्भ में प्रत्येक बेटी, बहू का कर्तव्य है कि वह अपना मूल्यांकन स्वयं करें।

मित्र बनाते समय और विवाह से पहले एक क्षण रुकना –

– विचार करना कि कहीं हम लड़के की किसी एक एक्टिंग या हॉबी से तो उस पर नहीं मर रहे हैं यदि ऐसा है तो हम गलत निर्णय ले रहे हैं। क्योंकि जिन्दगी एक्टिंग के सहारे नहीं गुजारी जा सकती है।
– विचार करना कि कहीं हम उसके पैकेज और लाइफ स्टाइल से तो प्यार नहीं कर रहे, यदि ऐसा है तो यह चीज लम्बे समय तक तुम्हें खुश नहीं रख सकती है।
-विचार करना कि कहीं हम लड़के की बॉडी फिटनेस, बात करने का स्टाइल, खुशमिजाजी से तो प्यार नहीं कर रहे हैं, यदि ऐसा है तो यह निर्णय भी जल्दबाजी का है।
– विचार करना कि दोस्त बनने वाले का कुल, जाति क्या है? कहीं बाद में हमें अपना धर्म छोड़ने को तो मजबूर नहीं होना पड़ेगा? कहीं हमें पति के लिए या उसके परिवार के लिए मांस, अण्डा बनाकर तो नहीं देना पड़ेगा?
– विचार करना कि तात्कालिक इन प्रेम भावनाओं में यह प्रेमी, मेरी हर एक बात मानने को तैयार है, कहीं यह मुझे फँसाने के लिए झूठ तो नहीं बोल रहा है? क्योंकि राजनीति और प्रेम में सब कुछ जायज होता है।
– विचार करना कि इसके दोस्त कैसे हैं? इसकी कॉलेज में रेप्यूटेशन कैसी है? इसकी रातें कहाँ गुजरती हैं?
– विचार करना कि ससुराल के लोग हमारा साथ नहीं देंगे तो पति के द्वारा परेशान करने पर या छोड़ देने पर मेरे साथ कौन होगा? जब कि हम अपने मायके से सम्बन्ध पहले ही तोड़ चुके हैं।
– विचार करना कि (Love Marriage) या (Court Marriage) के सम्बन्ध कितने सफल होते हैं? कहीं यह जल्दबाजी का निर्णय जीवन भर पछतावा, अवमानना और निराशा तो नहीं देगा।
– विचार करना कि यह दोस्त तुम्हारे स्वभाव के अनुरूप है या नहीं?
– विचार करना कि जिस धर्म को छोड़कर तुम उसे अपना रही हो उस धर्म को तुम दोबारा पा सकोगी या नहीं?
– विचार करना कि धर्म छोड़कर विवाह करने से तुम और तुम्हारी सन्तान के नाम के आगे क्या जैन आदि का टाइटिल लग पाएगा। यदि नहीं तो यह तुम्हारा अक्षम्य अपराध होगा।
– विचार करना कि तुम माता-पिता, भाई-बहिन जैसे जन्मजात रिश्तों को छोड़कर, इन सबकी आत्मा को दुखाकर इन नए रिश्तों में ज्यादा दिन तक कैसे खुश रह पाओगी?
– विचार करना कि तुम्हारा एक भावुकता का निर्णय तुम्हें इतना अभिशप्त न कर दे कि तुम एक दिगम्बर साधु के हाथ में एक अन्न का टुकड़ा रखने की भी पात्रता खो दो और तुम्हारी सन्तान मन्दिर में पूजन- अभिषेक करने की योग्यता भी न पा सके।
– विचार करना कि माता-पिता तुम्हारे इस निर्णय से कहीं रातों की नींद खोकर पागल तो नहीं हो जाएंगे?
– विचार करना कि तुम्हारा भाई तुम्हारे निर्णय को सुनकर तुम्हारे प्रेमी को या तुम दोनों को समाप्त करके खुद कहीं जेल की सलाखों में उम्र तो नहीं गुजारेगा ?
– विचार करना कि अपनी एक क्षुद्र कामना की पूर्ति के लिए हम अपने से जुड़े कितने लोगों के दिल में एक गहरा आघात पहुंचाएंगे।
– विचार करना कि बहुत लम्बे जीवन के इस दौर में इन तमाम अवहेलनाओं और परेशानियों को ओढ़कर हम किस समाज में इज्जत के साथ जी पाएंगें?

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