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दो विपरीत भावनाओं का सुन्दर चित्रण करता बदनावर से प्राप्त यह शिल्प : सुंदर कलात्मक आभूषणों से सुसज्जित देवी और भौतिकता से मुक्त वीतराग भाव से युक्त तीर्थंकर


अषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की सप्तमी दिनांक 13 जुलाई शनिवार को श्रमण संस्कृति के बाईसवें तीर्थंकर भगवान श्री नेमीनाथ स्वामी का मोक्ष कल्याणक दिवस है। आज ही के दिन हजारों वर्ष पूर्व नेमीनाथ स्वामी ने कर्म रूपी बंधनों को तोड़कर गुजरात राज्य के मनोरम श्री गिरनार पर्वत के उच्च शिखर से निर्वाण को प्राप्त किया था। पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट….


बदनावर। अषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की सप्तमी दिनांक 13 जुलाई शनिवार को श्रमण संस्कृति के बाईसवें तीर्थंकर भगवान श्री नेमीनाथ स्वामी का मोक्ष कल्याणक दिवस है। आज ही के दिन हजारों वर्ष पूर्व नेमीनाथ स्वामी ने कर्म रूपी बंधनों को तोड़कर गुजरात राज्य के मनोरम श्री गिरनार पर्वत के उच्च शिखर से निर्वाण को प्राप्त किया था। इस दिन जैन समाज के श्रावक श्राविकाओं द्वारा भगवान नेमीनाथ जी की पुजा अर्चना करते हुए निर्वाण लाडू समर्पित किया जाता है।

हरिवंश पुराण नाम से प्रसिद्ध

पाटोदी ने बताया कि बदनावर नगर के भूतकाल इतिहास का हम अध्ययन करते हैं तो पायेंगे कि प्राचीन वर्द्धमानपुर का जितना संबंध भगवान महावीर स्वामी के जीवन से रहा होगा उतना ही 22वें तीर्थंकर श्री नेमीनाथ भगवान से भी रहा क्योंकि भगवान नेमीनाथ जी श्री कृष्ण एवं वसुदेव के जीवन चरित्र पर एक वृहद ग्रंथ रचा गया जो हरिवंश पुराण के नाम से प्रसिद्ध हुआ इसकी रचना का श्रेय प्राचीन वर्द्धमानपुर बदनावर नगर को ही जाता है इसी धर्म धरा के शांतिनाथ चैत्यालय में ही बैठकर प्रबुद्धाचार्य श्री जिनसेण स्वामी जी ने आठवीं शताब्दी में की थी। इस नगर से प्रचुर मात्रा में प्राप्त जिनप्रतिमा इसका समर्थन करती है।

राग और विराग का संगम

भगवान नेमीनाथ जी से सम्बंधित कई सामग्री हमें यहां से प्राप्त हुई है जिसमें जयसिंहपुरा जैन संग्रहालय उज्जैन में सरल क्रमांक 151 पर संग्रहित भगवान श्री नेमीनाथ स्वामी की दक्षिणी अम्बिका देवी का यह कलात्मक शिल्प जहां एक ओर सुंदर आभूषणों से सुसज्जित देवी को प्रदर्शित करता है वहीं दूसरी ओर भौतिक संसाधनों से मुक्त आत्मध्यान में तल्लीन वीतराग छवि को धारण किए हुए तीर्थंकर की शांत भाव को प्रकट करता है। राग एवं विराग यह दोनों विपरीत भावनाओं का अद्भुत समागम हमें बदनावर वर्द्धमानपुर से प्राप्त मुर्तियो में देखने को मिलता है। यह जैन शिल्प की एक अद्भुत अद्वितीय विशेषता है। जो हमें अन्य कहीं बहुत कम ही मिल पाती है।

नहीं मिटा पाए इतिहास

पाटोदी ने बताया कि श्री नेमीनाथ जी की एक मनोज्ञ प्रतिमा यहां से प्राप्त हुई जिसे कि आक्रांताओं ने खंडित कर दिया परंतु वे इतिहास को नहीं मिटा पाए। हजारों वर्ष बाद भी इतिहास मानो पुनः जीवित हो कर हमे उस समय की जानकारी दे रहा है। यह प्रतिमा वर्तमान में उज्जैन संग्रहालय में ही सरल क्रमांक 82 पर प्रदर्शित है। इसके पाद मूल में भगवान ने नाथ का लांछन शंख अंकित है चूंकि प्रतिमा को खंडित कर दिया गया था परन्तु इसकी बनावट आकर्षित करती है। इस प्रतिमा पर दो लाइन का लेख भी अंकित है। जो हमें उसे काल की सूचना प्रदान करता है।

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