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धर्मसभा में दिए प्रवचन : आचार्य श्री के प्रकल्पों को हम सब मिलकर पूर्ण करें- मुनि श्री निष्पक्षसागर जी महाराज


 पूज्य मुनि श्री निष्पक्ष सागर जी महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि प्रतिकूलता में उन्होंने कभी हार नहीं मानी। रोग ने उनको हरा दिया लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने अपने आप को कभी बूढ़ा नहीं माना, बुजुर्ग नहीं माना, उत्साह से भरे होते थे। आचार्य भगवान के सपनों को पूर्ण करने में हम सभी को सहभागी बनना है। पढ़िए राजीव सिंघई मोनू की रिपोर्ट…


कुंडलपुर। सुप्रसिद्ध सिद्ध क्षेत्र कुंडलपुर में युग श्रेष्ठ संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य पूज्य आचार्य श्री समय सागर जी महाराज के मंगल आशीर्वाद से पूज्य मुनि श्री निष्पक्ष सागर जी महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि कुंडलपुर है बड़े बाबा का दरबार, गुरु जी की कृपा है जेष्ठश्रेष्ठ मुनि श्री का आशीर्वाद है। घर होता है, परिवार होता है, बड़े-बुजुर्ग होते हैं। उन बड़े बुजुर्गों से हमें बहुत कुछ सीखने, समझने, सुनने मिलता है। यदि वह बुजुर्ग हमें हमारी संस्कृति से परिचित न कराते हमारी विरासत से परिचित न कराते तो हम शून्य हैं। यह बुजुर्गों का ही पुण्य है हमारे सामने प्रतिफल है बुजुर्गों का पूर्वजों का कि आज आप और हम यहां बैठे हैं।

यदि उन्होंने यह संस्कार न दिए होते यह संस्कृति न दी होती तो हम कहां होते, आप कहां होते। यह सब संस्कारों का ही प्रताप है, प्रभाव है। उन संस्कारों का ही प्रताप आज फलीभूत हो रहा है। उन्होंने कहा कि आचार्य भगवन विद्यासागर जी महाराज हम सबके बीच में हैं लेकिन उन्होंने हम सबको संस्कारित किया। मार्ग दिया, दिशा दी, हमारी दशा को व्यवस्थित किया। घर में जो बुजुर्ग होते हैं, घर में गृहस्थ लोग होते हैं, जो दादाजी होते हैं, वे नाती के सामने बोलते हैं कि मैंने बहुत कुछ सोचा था अब शरीर साथ नहीं दे रहा है। उम्र का प्रभाव है रोगों ने घेर लिया सक्षम नहीं हूं। मैंने सपना देखा है मैंने परिकल्पना की है।

मैं परिकल्पना को पूर्ण शायद नहीं कर पाऊंगा लेकिन आप लोग तो हैं। जब सामान्य से दादाजी की छोटी सी इच्छा को, परिकल्पना को विचार को पूर्ण करने ऐसा बोला दादाजी की ऐसी इच्छा थी तो हमें पूर्ण करना चाहिए। हमारे आध्यात्मिक के पुरोधा गुरुवर आचार्य विद्यासागर जी महाराज ने एक दादाजी के रूप में हमें बहुत कुछ दिया, बहुत कुछ क्या सब कुछ दिया नहीं तो मैं तो शून्य था। आज मुनि श्री योग सागर जी का हाईकू याद आ रहा है सुंदर हाइकु है। मैं तो शून्य था संख्या के पीछे आया मूल्यता आई। शून्य का कोई मूल्य नहीं होता उसके पीछे एक लिख दो तो उसका मूल्य हो जाता।

करोड़ों की संख्या हो जाती हम सब शून्य थे। आचार्य महाराज ने सब कुछ दे दिया वह जो साधारण गृहस्थ हैं वह भी दादाजी के सपने को पूर्ण करने में एड़ी चोटी का जोर लगाते। हमारे पिताजी, दादाजी, माता जी सब कुछ वो ही थे। आजकल एक भजन बहुत सुनने में आ रहा है उसकी एक दो पंक्तियां। उसने हमको सब कुछ दिया हम उनको कुछ ना दे पाए। उनने सब कुछ दिया, अब हमारी बारी है हम सब की बारी है। उनके प्रति अपनी विनयांजलि यही होगी कि गुरुदेव ने कुछ प्रकल्प प्रारंभ किये, जो इस जैन संस्कृति को जीवित रखने वाले हैं। इस जैन संस्कृति का गुणगान और यशगान बढ़ाने वाली है। स्थापत्य कला से निर्मित होने वाले जो पाषाण के जिनालय और उनमें निर्मापित होने वाली अष्टधातु के जिनविम्ब जिनकी उम्र युगों युगों तक हजारों वर्षों तक जैनत्व की गौरव गाथा का गुणगान करेंगी। उनमें से बहुत से प्रकल्प आचार्य भगवान ने पूर्णता को प्राप्त होते देखे हैं और कुछ उनके सपने रह गए।

जाते-जाते आचार्य भगवन अमरकंटक पंचकल्याणक के बाद सहस्रकूट जिनालय को जिन्होंने पूर्ण होते देखा। ऐसे 18–20सहस्त्रकूट जिनालय का शिलान्यास उनके माध्यम से हो चुका है। प्रतिकूलता में उन्होंने कभी हार नहीं मानी। रोग ने उनको हरा दिया लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने अपने आप को कभी बूढ़ा नहीं माना, बुजुर्ग नहीं माना, उत्साह से भरे होते थे। आचार्य भगवान के सपनों को पूर्ण करने में हम सभी को सहभागी बनना है। आचार्य समय सागर जी महाराज के साथ कंधे से कंधा मिलाकर सभी संघ को आगे बढ़ाना है। समय के साथ सबको चलना है।

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