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मंगल गीतों का गायन किया : श्री दिगंबर जैन सोशल ग्रुप महिला की सदस्यों ने जैन साध्वी को सामूहिक रूप से दिया आहार


श्री पारसनाथ दिगंबर जैन मंदिर में इन दिनों विराजमान जैन साध्वी विश्रेय श्री माता जी को श्री दिगंबर जैन सोशल महिला ग्रुप की सदस्यों ने शुक्रवार को सामूहिक रूप से आहार देकर जैन धर्म की प्राचीन परंपरा का निर्वहन किया। इस दौरान ग्रुप की अध्यक्ष रीता जैन, महामंत्री लक्ष्मी जैन एवं कोषाध्यक्ष मानसी जैन सहित अनेक सदस्य महिलाएं मौजूद थीं। पढ़िए अजय जैन की रिपोर्ट…


अम्बाह। श्री पारसनाथ दिगंबर जैन मंदिर में इन दिनों विराजमान जैन साध्वी विश्रेय श्री माता जी को श्री दिगंबर जैन सोशल महिला ग्रुप की सदस्यों ने शुक्रवार को सामूहिक रूप से आहार देकर जैन धर्म की प्राचीन परंपरा का निर्वहन किया। इस दौरान ग्रुप की अध्यक्ष रीता जैन, महामंत्री लक्ष्मी जैन एवं कोषाध्यक्ष मानसी जैन सहित अनेक सदस्य महिलाएं मौजूद थीं। इस आहारचार्य के मार्गदर्शक विमल जैन भंडारी ने बताया कि जैन साध्वी की आहार चर्या कठिन होती है। दिन में मात्र एक बार वह शुद्ध भोजन और पानी का सेवन करती हैं।

भंडारी ने बताया कि देश में हर धर्म में साधु संतों के आहार(भोजन) करने के अलग- अलग नियम होते हैं, वहीं जैन संत एवं साध्वी की आहारचर्या भी अंचभित करने वाली है। जैन साधु संत की आहारचर्या इतनी कठिन होती है कि विधि नहीं मिलने पर साधु संत को कई दिनों तक भूखा रहना पड़ता है। उन्होंने बताया कि जैन साध्वी विश्रेय श्री माता जी 24 घंटे में सिर्फ एक बार भोजन और पानी लेती हैं, इसका भी अपना तय समय है। सूर्योदय होने के बाद पांच से छह घंटे में आहार चर्या हो जाती है। इनकी आहारचर्या इनकी साधना का अहम हिस्सा है। यह स्वाद के लिए भोजन नहीं करती हैं। यह धर्म साधना के लिए भोजन करती हैं। यह साधना आम इंसान के लिए काफी कठिन होती है। यदि उन्हें निश्चित धारणा नहीं मिलती है, तो वह वैसे ही वापस लौट जाती हैं।

त्याग का दिलवाती हैं संकल्प

विमल जैन भंडारी ने बताया कि साध्वी की आहारचर्या को सिंहवृत्ति कहते हैं। वह एक ही स्थान पर बैठकर आहार ग्रहण करती हैं, यदि भोजन के साथ चींटी, बाल, कोई अपवित्र पदार्थ या अन्य कोई जीव आ जाए तो उसी समय वह भोजन लेना बंद कर देती हैं। उसके बाद वह पानी भी नहीं पीती है। इस विधि से भोजन करने से भोजन के प्रति आसक्ति दूर होती है। वहीं जैन साध्वी श्रावक से आहार से पूर्व सबसे कुछ न कुछ त्याग दिलवाती हैं।

किसी को रात्रि भोजन का त्याग करवाती हैं तो किसी को नित्य देव दर्शन का संकल्प दिलवाती हैं। किसी को जमीकंद त्याग का संकल्प दिलवाती हैं। उसी के बाद श्रावक के हाथों से आहार ग्रहण करती हैं।

जैन साध्वी विश्रेय श्री माता जी कहती हैं कि दिन में एक बार आहार करने के पीछे कई कारण हैं। शरीर से ममत्व भाव को कम करना। धर्म साधना करते समय आलस्य ना आ जाए। इसलिए भोजन को शुद्धता के साथ बनाया जाता बहुत जरूरी होता है। जैन संत स्वाद के लिए भोजन नही करते है। वह धर्म साधना के लिए भोजन करते है।

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