मुनि श्री विहसंतसागर महाराज ने कहा कि हमें कभी भी मंदिर की द्रव्य का हरण नहीं करना चाहिए यदि कोई ऐसा करता है तो उसका पुण्य क्षीण हो जाता है। पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट…
डबरा। आरोग्यमय वर्षायोग समिति द्वारा गणाचार्य 108 श्री विराग सागर जी मुनिराज का चित्र अनावरण एवं दीप प्रज्वलन करके बड़े ही भक्ति भाव से किया गया। इसके बाद मेडिटेशन गुरु उपाध्याय श्री 108 विहसंतसागर जी महाराज की सभी भक्तों ने अष्ट द्रव्य से पूजा अर्चना की। गुरुदेव ने भक्तामर स्तोत्र के उनीसवें काव्य में मुनिवर ने कहा कि हे नाथ ! खेत में धान्य पक जाने पर बादलों का वर्षा के लिए झुकने से क्या लाभ ? वैसे ही आपके मुख कमल से सभी अंधकार मिट गया तो अब दिन में, रवि रात्रि में शशि का क्या लाभ ? अर्थात् कुछ नहीं। हमें कभी भी मंदिर की द्रव्य का हरण नहीं करना चाहिए यदि कोई ऐसा करता है तो उसका पुण्य क्षीण हो जाता है।

कहानी से समझाया
शास्त्रों में अकृत पुण्य की कहानी आती है। एक दिन एक व्यक्ति ने मंदिर की द्रव्य का हरण कर लिया था और वह उसी द्रव्य से अपना जीवन यापन करता था। एक दिन उसकी मृत्यु हो गई फिर उसके बाद एक निर्धन परिवार में जन्म लिया। एक दिन अकृतपुण्य सेठ के बालकों को खीर खाते देखकर वह उनसे अकृतपुण्य भी खीर मांगा करता था। तब एक दिन सेठ के लड़कों ने बालक को थप्पड़ों से मारा। सेठ ने उक्त घटना को जानकर बहन को खीर बनाने के लिए सारा सामान दे दिया। माता ने खीर बनाकर बालक से कहा-बेटा! मैं पानी भरने जाती हूँ, इसी बीच में यदि कोई मुनिराज आएं तो उन्हें रोक लेना, मैं मुनिराज को आहार देकर तुझे खीर खिलाऊंगी। भाग्य से सुव्रत मुनिराज उधर आ गये।

बालक ने कहा-मुनिराज! आप रुको, मेरी मां ने खीर बनाई है, आपको आहार देंगी। मुनिराज के न रुकने से बालक ने जाकर उनके पैर पकड़ लिये और बोला-‘देखूं अब कैसे जाओगे?’ उधर माता ने आकर पड़गाहन करके विधिवत् आहार दिया। बालक आहार देख-देखकर बहुत प्रसन्न हो रहा था। मुनिराज अक्षीण ऋद्धिधारी थे। उस दिन खीर का भोजन समाप्त ही नहीं हुआ। कार्यक्रम में ग्वालियर से पंडित जी कुशल चन्द्र जैन ने गुरुदेव को श्रीफल भेंट कर आशीर्वाद प्राप्त किया। आज प्रवचन में अनुराग जैन शास्त्री, साहिल जैन, अमन जैन, सक्षम जैन कई युवा एवं महिलाएं- पुरुष उपस्थित थे।













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