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साइंस ऑफ लिविंग सत्र जारी : लड़ाई हो तो भरत-बाहुबली जैसी हो, वरना न हो – मुनि श्री निरंजनसागर जी महाराज


कुंडलपुर में मुनि श्री निरंजन सागर महाराज ने प्रवचन के दौरान कहा कि हमें भरत-बाहुबली से सीखना चाहिए, जिन्होंने युद्ध विजय के बाद वैराग्य धारण किया था। पढ़िए जयकुमार जैन जलज/राजेश रागी की विशेष रिपोर्ट…


कुंडलपुर। साइंस ऑफ लिविंग में आज हम एक ऐसा अनोखा विषय प्रस्तुत कर रहे हैं, जिससे हर व्यक्ति परिचित है। पर क्या उचित है, क्या अनुचित है, यह समझने का प्रयास हम सभी करेंगे। संपत्ति और स्वाभिमान को लेकर एक ऐसा महायुद्ध हुआ, जिसका अपना ही इतिहास है। यूं तो रामायण और महाभारत आदि बड़े-बड़े ग्रंथ युद्ध और योद्धाओं के रण कौशल और वीरता के इतिहास से भरे पड़े हैं। पर आज हम जिस युद्ध की चर्चा करने जा रहे हैं, वह युद्ध भी विशेष है और उसके योद्धा भी। उस युद्ध की दर्शक थी दोनों पक्ष की सेना। यह बात मुनि श्री निरंजन सागर जी महाराज ने प्रवचन के दौरान कही।

उन्होंने कहा कि प्रश्न खड़ा होता है कि जब सेना दर्शक थी तो युद्ध हुआ किसमें? इस प्रश्न का उत्तर मिला आचार्य जिनसेन स्वामी द्वारा लिखित ग्रंथराज आदिपुराण में। दोनों ही सेनाओं में जो मुख्य- मुख्य मंत्री आदि थे, उन्होंने विचार विमर्श किया। ये दोनों भाई आदि ब्रह्मा आदिनाथ भगवान के पुत्र थे। एक चक्रवर्ती सम्राट भरत है, जिनके नाम पर इस देश का नाम भारत पड़ा और जिनके सामने पूरा विश्व नतमस्तक है। अर्थात सम्राट भरत ने संपूर्ण पृथ्वी पर दिग्विजय प्राप्त की है। दूसरे हैं महाराज बाहुबली जिनमें यथा नाम तथा गुण है अर्थात महाराज बाहुबली के बाहुबल के आगे कोई भी नहीं टिक पाया। दोनों चरम शरीरी हैं। इनके पराक्रम के आगे देवता भी नतमस्तक हैं। इन दोनों महावीरों की तो कुछ भी क्षति नहीं होगी।

केवल युद्ध के कारण से दोनों पक्षों के लोगों का ही मरण होगा। जब इस बात का भरत और बाहुबली के समक्ष निवेदन किया, तब दोनों वीर सम्राटों ने बड़े धैर्य के साथ विचार कर कहा कि हमारे वर्चस्व के संग्राम में किसी प्रकार की ना ही जनहानि हो और ना ही धन हानि। बस यहां हानि अगर होगी तो वह होगी अहंकार की मान की। एक ऐसा युद्ध हो जिसमें हम दोनों ही परस्पर में जय- पराजय का निर्णय करें। धर्मयुद्ध की एक ऐसी संयोजना बनाई गई जिसमें जल युद्ध, दृष्टि युद्ध और मल्ल युद्ध ऐसे तीन युद्धो के माध्यम से निर्णय हो सके। तीनों ही युद्धों में छोटे भाई बाहुबली विजय श्री को प्राप्त हुए।

चक्रवर्ती भरत के मान को गहरा धक्का लगा और उन्होंने क्रोध के आवेग में अपना सुदर्शन चक्र बाहुबली के ऊपर चला दिया। चूंकि देवोपनीत शस्त्र कुटुंब के लोगों पर कार्यकारी नहीं रहता है। अतः वह चक्र भी बाहुबली की परिक्रमा कर शांत हो गया। भरत चक्रवर्ती के इस कृत्य को सभी ने निंदनीय कहा और चहुंओर से बाहुबली की जय-जयकार से वातावरण गुंजायमान हो गया। उस समय एक ऐसा महान आश्चर्य कारी दृश्य सभी के देखने में आया, जिसमें सभी दर्शकों की आंखें और ह्रदय भीग गए। विजयश्री प्राप्त होने पर भी बाहुबली को घोर पश्चाताप हुआ। बाहुबली ने कहा कि बड़ा भाई पिता तुल्य होता है और मैं इतना निकृष्ट कैसे हो गया कि पिता तुल्य बड़े भाई पर इस नश्वर राजलक्ष्मी के लिए मैंने कितना बड़ा अपराध कर डाला।

मुझे क्षमा कर दीजिए। मैं इस वैभव का त्याग कर वैराग्य की ओर जा रहा हूं। मैं इस राजलक्ष्मी का त्याग कर तपलक्ष्मी को अंगीकार करता हूं। मैं दिगंबर जैनेश्वरी दीक्षा को स्वीकार करता हूं। भरत महाराज ने कहा, भाई तुमने नहीं मैंने दुष्टता का कार्य किया है। छोटा भाई तो पुत्र के समान होता है। यह मुझसे बहुत बड़ा पाप हो गया है, अनर्थ हो गया है। भाई मुझे क्षमा कीजिए। दोनों भाई फूट-फूटकर एक दूसरे से क्षमा याचना कर रहे। दोनों भाई अपने आप को अपराधी कह रहे, पापी कह रहे हैं और भाई से भाई क्षमा प्रार्थना कर रहे हैं ।बाहुबली अपने संकल्प पर दृढ़ रहते हुए पुत्र महाबली को राज्य सौंपते हुए कह गए कि भरत महाराज की आज्ञा अनुसार राज्य शासन करना। वे बड़े हैं ,महान है उनके मार्गदर्शन में ही कार्य करना। इतना कह सभी से क्षमा याचना कर बाहुबली वन को चले गए। यह प्रसंग बहुत मार्मिक शिक्षा देता है।

बाहुबली तो वन को गए और हम थाने जाते हैं, कोर्ट जाते हैं। भरत -बाहुबली तो एक -दूसरे से क्षमा याचना कर रहे थे और हम एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप करते रहते हैं। क्या कभी हमें हमारे जीवन में कभी ऐसे प्रसंग पर वैराग्य आया है, आत्म ग्लानि हुई, पश्चाताप हुआ, क्यों नहीं हुआ? प्रश्न का उत्तर आप सभी जानते हैं।

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Shreephal Jain News

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