बांसवाड़ा में आचार्य श्री 108 कनक नंदी गुरुदेवश्री संघ के सान्निध्य में भगवान शांतिनाथ का मोक्ष कल्याणक श्रद्धा एवं भक्ति के साथ मनाया गया। आचार्य श्री ने सिद्ध भगवान के गुणों का वर्णन करते हुए आत्मशुद्धि और मोक्षमार्ग पर चलने की प्रेरणा दी। पढ़िए श्रीफल साथी अजीत कोठिया डडूका की यह रिपोर्ट।
बांसवाड़ा (राजस्थान)। आचार्य भगवान श्री 108 कनक नंदी गुरुदेवश्री संघ के पावन सान्निध्य में भगवान शांतिनाथ का मोक्ष कल्याणक श्रद्धा, भक्ति एवं आध्यात्मिक उल्लास के साथ मनाया गया। इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाओं ने उपस्थित होकर पूजा, आराधना एवं धर्मसभा का लाभ प्राप्त किया।
मोक्ष का वास्तविक स्वरूप बताया
आचार्य श्री कनक नंदी गुरुदेव ने अपने मंगल प्रवचन में कहा कि मोह का पूर्ण क्षय ही मोक्ष है। जब साधक उत्कृष्ट ध्यान के माध्यम से घातिया कर्मों का क्षय करता है, तब केवलज्ञान प्रकट होता है और शेष कर्मों के नष्ट होने पर आत्मा सिद्ध पद को प्राप्त कर परमात्मा बन जाती है।
सिद्ध भगवान के गुणों का किया वर्णन
आचार्य श्री ने कहा कि सिद्ध भगवान अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत सुख और अनंत वीर्य से संपन्न होते हैं। वे सिद्धशिला पर विराजमान रहते हैं, कर्मों से पूर्णतः मुक्त, राग-द्वेष से रहित एवं अव्याबाध स्वरूप हैं। वे न किसी को कष्ट देते हैं और न किसी से कष्ट प्राप्त करते हैं। उनका अस्तित्व पूर्णतः स्वतंत्र एवं शाश्वत होता है।
स्वयं को परमात्मा बनाने का करें प्रयास
उन्होंने कहा कि निश्चय नय से भगवान और हम सभी जीवद्रव्य हैं, किंतु व्यवहार नय से भगवान पूर्णतः शुद्ध एवं कर्मरहित हैं, जबकि हम कर्मबंधन के कारण जन्म-मरण के चक्र में भटक रहे हैं। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को भगवान के गुणों का अनुसरण कर आत्मशुद्धि का प्रयास करना चाहिए।
भक्ति का लाभ भक्त को ही मिलता है
आचार्य श्री ने स्पष्ट किया कि भगवान को हमारी पूजा, स्तुति या भक्ति की आवश्यकता नहीं होती। वे सदा पूर्ण, प्रसन्न और निर्विकार हैं। भगवान के गुणों का स्मरण और गुणानुवाद करने से भक्त के भाव निर्मल होते हैं, कर्मों का क्षय होता है तथा आत्मा मोक्षमार्ग की ओर अग्रसर होती है। एक दिन पूजक ही पूज्य बनने की पात्रता प्राप्त कर लेता है।
धर्मसभा में श्रद्धालुओं ने लिया धर्मलाभ
मोक्ष कल्याणक महोत्सव में बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाओं ने सहभागिता कर धर्मलाभ अर्जित किया। कार्यक्रम का वातावरण भक्ति, श्रद्धा एवं आत्मचिंतन से ओत-प्रोत रहा।













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