आचार्य श्री 108 उदारसागर जी महाराज ससंघ के इस वर्ष मुरैना में वर्षायोग स्थापित होने की प्रबल संभावना है। मंदिर समिति तैयारियों में जुटी है और 25 या 26 जुलाई को मंगल प्रवेश होने की संभावना व्यक्त की जा रही है। पढ़िए श्रीफल साथी मनोज जैन नायक की यह रिपोर्ट।
मुरैना। जैन संत आचार्य श्री 108 उदारसागर जी महाराज ससंघ के इस वर्ष मुरैना स्थित श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में वर्षायोग स्थापित होने की प्रबल संभावना है। विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार मंदिर समिति द्वारा किए गए सतत प्रयासों के सकारात्मक परिणाम सामने आते दिखाई दे रहे हैं।
वर्षायोग की तैयारियां अंतिम चरण में
जानकारी के अनुसार वर्ष 2024 में युगल मुनि श्री प्रशंसानंद जी महाराज तथा वर्ष 2025 में मुनि श्री विलोकसागर जी एवं मुनि श्री विवोधसागर जी महाराज का वर्षायोग बड़ा जैन मंदिर में सम्पन्न हुआ था। वर्ष 2026 के लिए भी मंदिर समिति लंबे समय से किसी मुनिराज अथवा आर्यिका संघ के वर्षायोग की स्वीकृति के प्रयास कर रही थी।
25 या 26 जुलाई को हो सकता है मंगल प्रवेश
बड़ा जैन मंदिर समिति के मंत्री विनोद जैन तार वाले ने बताया कि आचार्य श्री उदारसागर जी महाराज ससंघ झांसी, दतिया, डबरा एवं ग्वालियर होते हुए मुरैना की ओर पदविहार कर रहे हैं। ग्वालियर पहुंचने के बाद वर्षायोग स्थापना एवं नगर प्रवेश की औपचारिक घोषणा होने की संभावना है। अनुमान है कि 25 या 26 जुलाई को संघ का भव्य मंगल प्रवेश मुरैना में हो सकता है।
चार पिच्छिकाओं का संघ कर रहा पदविहार
वर्तमान में आचार्य संघ में आचार्य श्री उदारसागर जी महाराज, मुनि श्री उपशांतसागर जी महाराज, ऐलक श्री उत्साहसागर जी महाराज तथा क्षुल्लक श्री उपकारसागर जी महाराज सहित कुल चार पिच्छिकाओं का संघ मुरैना की ओर पदविहार कर रहा है।
आचार्य श्री का संक्षिप्त परिचय
आचार्य श्री उदारसागर जी महाराज का गृहस्थ नाम मुकेश जैन था। आपका जन्म 3 दिसंबर 1961 को मध्यप्रदेश के दमोह जिले के बांसा-तारखेड़ा ग्राम में हुआ। आपने वर्ष 1980 में ब्रह्मचारी व्रत, 1987 में क्षुल्लक दीक्षा, 1988 में ऐलक दीक्षा तथा वर्ष 2007 में मुनि दीक्षा ग्रहण की। वर्ष 2016 में आपको आचार्य पद से विभूषित किया गया। तप, त्याग, साधना एवं अनुशासित जीवन के कारण आप देशभर में श्रद्धा के केंद्र हैं।
वर्षायोग का आध्यात्मिक महत्व
जैन दर्शन में वर्षायोग का विशेष महत्व है। वर्षा ऋतु में सूक्ष्म जीवों की रक्षा हेतु जैन साधु-संत चार माह तक एक ही स्थान पर निवास करते हैं। इस अवधि में वे ध्यान, तप, स्वाध्याय एवं धर्मप्रभावना के माध्यम से समाज को अहिंसा, संयम, सदाचार और आत्मकल्याण का संदेश देते हैं। साथ ही श्रद्धालु भी उपवास, आयंबिल, स्वाध्याय, दान एवं धार्मिक आराधना के माध्यम से अपने जीवन को संस्कारमय बनाने का प्रयास करते हैं।













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