तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी के लिए ऐसा ही एक गौरवपूर्ण और अविस्मरणीय अवसर तब आया, जब चर्या शिरोमणि, आध्यात्मिक योगी, पट्टाचार्य आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी महाराज अपने सहित 25 मुनिराजों के ससंघ यूनिवर्सिटी परिसर में पधारे। मुरादाबाद से पढ़िए, प्रो.श्याम सुंदर भाटिया की यह रिपोर्ट…
मुरादाबाद। कभी-कभी इतिहास ऐसे क्षणों का साक्षी बनता है, जो केवल घटनाएं नहीं होतीं, बल्कि पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन जाते हैं। तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी के लिए ऐसा ही एक गौरवपूर्ण और अविस्मरणीय अवसर तब आया, जब चर्या शिरोमणि, आध्यात्मिक योगी, पट्टाचार्य आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी महाराज अपने सहित 25 मुनिराजों के ससंघ यूनिवर्सिटी परिसर में पधारे। उनके दिव्य चरणों से टीएमयू का प्रत्येक कोना आध्यात्मिक ऊर्जा, श्रद्धा, संयम और ज्ञान की पवित्र आभा से आलोकित हो उठा। गुरुवार सायंकाल यूनिवर्सिटी के मुख्य प्रवेश द्वार पर कुलाधिपति परिवार, यूनिवर्सिटी प्रशासन, शिक्षकगण, छात्र-छात्राओं तथा बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने पुष्पवर्षा कर आचार्य श्री एवं ससंघ का भावभीना स्वागत किया।

आचार्य श्री का किया पाद प्रक्षालन
णमोकार मंत्र के पावन उच्चारण, मंगल गीतों और भक्ति की मधुर स्वर लहरियों के बीच सम्पूर्ण वातावरण ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो स्वयं आध्यात्मिकता धरती पर अवतरित हो गई हो। ससंघ सबसे पहले यूनिवर्सिटी जिनालय पहुंचे, जहां विधि-विधान से आचार्य श्री का पाद-प्रक्षालन, मंगल आरती एवं भव्य पूजन सम्पन्न हुआ। इसके पश्चात संत भवन तक निकली मंगल यात्रा श्रद्धालुओं के लिए भक्ति, अनुशासन और विनम्रता का अनुपम दृश्य बन गई।
प्रथम जल-अर्घ्य समर्पित कर पूजा का शुभारंभ
यूनिवर्सिटी के रिद्धि-सिद्धि भवन में शुक्रवार प्रातः भगवान महावीर की पावन शांतिधारा, अष्ट-द्रव्य अर्घ समर्पण का भव्य एवम् आध्यात्मिक आयोजन हुआ। कुलाधिपति सुरेश जैन एवं उनके परिवार ने प्रथम जल-अर्घ्य समर्पित कर पूजा का शुभारंभ किया। इसके उपरांत दिगंबर जैन समाज, विश्वविद्यालय के शिक्षकगण, छात्र-छात्राओं, विश्वविद्यालय परिवार तथा देश के विभिन्न क्षेत्रों से पधारे श्रद्धालुओं ने क्रमशः चंदन, अक्षत, पुष्प, नैवेद्य, दीप, धूप एवं फल अर्पित कर अपनी अटूट श्रद्धा व्यक्त की।
ग्रंथ वस्तुत्व महाकाव्य की प्रतियां भेंट की
पूरे आयोजन में अनुशासन, श्रद्धा और आध्यात्मिक सौहार्द का अद्भुत समन्वय देखने को मिला। इस अवसर की एक विशेष उपलब्धि यह भी रही कि आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी महाराज ने अपने द्वारा रचित महत्त्वपूर्ण ग्रंथ वस्तुत्व महाकाव्य की प्रतियां आशीर्वाद स्वरूप कुलाधिपति सुरेश जैन, जीवीसी मनीष जैन तथा एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर अक्षत जैन को भेंट कीं।
केंद्रीय पुस्तकालय में उपलब्ध रहेगा ग्रंथ
यूनिवर्सिटी प्रशासन ने घोषणा की कि यह ग्रंथ यूनिवर्सिटी के जिनालय तथा केंद्रीय पुस्तकालय में विद्यार्थियों, शोधार्थियों और शिक्षकों के अध्ययन हेतु उपलब्ध कराया जाएगा, जिससे भारतीय ज्ञान परंपरा एवं जैन दर्शन पर गंभीर अकादमिक अध्ययन को नई दिशा मिलेगी।
शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य विवेक, संस्कार और आत्मबोध का जागरण
अपने मंगल प्रवचन में आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी महाराज ने कहा कि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल रोजगार नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर विवेक, संस्कार और आत्मबोध का जागरण है। उन्होंने विद्यार्थियों, शोधार्थियों एवम् शिक्षकों का आह्वान करते हुए कहा, भारतीय आगमों और प्राचीन ज्ञान-विज्ञान का गंभीर अध्ययन समय की आवश्यकता है। उन्होंने प्रश्न किया कि आगमों में ऐसे कौन-से वैज्ञानिक और दार्शनिक सूत्र निहित हैं, जिन्हें आज की पीढ़ी तक पहुंचाया जाना चाहिए? अपने आशीर्वचनों में उन्होंने कामना व्यक्त की कि तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी ज्ञान, अनुसंधान, संस्कृति और मानवीय मूल्यों के क्षेत्र में विश्व के नए शिखरों को स्पर्श करे। ज्ञान का प्रकाश फैले और अज्ञान का अंधकार समाप्त हो।
चांसलर आवास- संवृद्धि में हुआ आहार
चांसलर आवास- संवृद्धि में आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी महाराज का विधिपूर्वक आहार सम्पन्न हुआ, जबकि ससंघ विराजमान अन्य 24 संतों का आहार यूनिवर्सिटी परिसर के विभिन्न स्थानों पर अत्यंत श्रद्धा और विनम्रता के साथ कराया गया।
कुलाधिपति परिवार ने आशीर्वाद प्राप्त किया
इस अवसर पर कुलाधिपति परिवार की प्रथम महिला वीना जैन, ऋचा जैन, जहान्वी जैन, यूनिवर्सिटी परिवार तथा दिगंबर जैन समाज के अनेक गणमान्य श्रद्धालुओं ने संतों का मंगलाशीर्वाद प्राप्त किया। विद्वान पंडित ऋषभ शास्त्री की गरिमामयी उपस्थिति ने आयोजन को और अधिक आध्यात्मिक ऊंचाई प्रदान की।
शिक्षा और अध्यात्म का अद्वितीय संगम
शुक्रवार की सायंकाल आचार्य श्री 108 विशुद्ध सागर जी महाराज ससंघ ने टीएमयू परिसर से मंगल विहार किया। उनके प्रस्थान के पश्चात भी यूनिवर्सिटी परिसर में उनकी दिव्य वाणी, संयममय जीवन और आध्यात्मिक ऊर्जा की अनुभूति लंबे समय तक बनी रही। निस्संदेह, यह आयोजन केवल एक धार्मिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि शिक्षा और अध्यात्म के अद्वितीय संगम का ऐसा प्रेरणास्पद अध्याय था, जिसने यह संदेश दिया कि जब ज्ञान के मंदिर में तप, त्याग और आत्मानुशासन के प्रतीक संतों का आगमन होता है, तब शिक्षा केवल सूचना नहीं रहती वह संस्कार, सेवा और आत्मबोध का माध्यम बन जाती है।













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