दिगंबर जैन परंपरा में 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी के पंच कल्याणकों में गर्भ कल्याणक प्रथम कल्याणक है। जैन आगमों के अनुसार आज से 2624 वर्ष पूर्व आषाढ़ शुक्ल षष्ठी की रात्रि को अंतिम केवली तीर्थंकर भगवान महावीर का जीव देवलोक से च्युत होकर माता त्रिशला देवी के गर्भ में अवतरित हुआ था। श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रृंखला में आज पढ़िए उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित और संपादित प्रस्तुति…
इंदौर। दिगंबर जैन परंपरा में 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी के पंच कल्याणकों में गर्भ कल्याणक प्रथम कल्याणक है। जैन आगमों के अनुसार आज से 2624 वर्ष पूर्व आषाढ़ शुक्ल षष्ठी की रात्रि को अंतिम केवली तीर्थंकर भगवान महावीर का जीव देवलोक से च्युत होकर माता त्रिशला देवी के गर्भ में अवतरित हुआ था। इसी दिन से छह मास पूर्व कुबेर द्वारा रत्नवर्षा और नगर की समृद्धि का दौर प्रारंभ हुआ, जिसे ‘गर्भान्वय’ कहा जाता है।
गर्भ कल्याणक से जुड़ी मान्यताएं और आयोजन
गर्भ में आने से पूर्व माता त्रिशला ने 16 मांगलिक स्वप्न देखे थे, जिनमें ऐरावत हाथी, वृषभ, सिंह, लक्ष्मी, पुष्पमाला आदि शामिल थे और ये सभी तीर्थंकर के जन्म के सूचक माने जाते हैं। इंद्र ने आकर स्वप्न फल बताया कि आपके गर्भ से त्रिलोक पूज्य तीर्थंकर जन्म लेंगे। गर्भ कल्याणक से छह माह पूर्व से ही देवों द्वारा प्रतिदिन सवा करोड़ रत्नों की वर्षा की गई, जिससे वैशाली नगरी की दरिद्रता दूर हुई। इस पुण्य तिथि पर दिगंबर जैन मंदिरों में प्रातः महामस्तकाभिषेक, शांतिधारा, नित्य पूजा, विधान, गर्भ कल्याणक पाठ, 16 स्वप्न के अर्घ्य, पालना झुलाना और शाम को दीप सज्जा, भजन और प्रवचन होते हैं। श्रावक इस दिन उपवास, जाप और दान करते हैं और इंदौर सहित सभी तीर्थ स्थलों पर विशेष महोत्सव मनाए जाएंगे।
भगवान महावीर के मूल सिद्धांत
भगवान महावीर ने आत्म-कल्याण और विश्व-शांति के लिए पांच मुख्य सिद्धांत दिए, जिन्हें ‘पंच महाव्रत’ कहा गया। पहला सिद्धांत अहिंसा है, जिसका अर्थ मन-वचन-काय से किसी भी जीव को कष्ट न देना है और यही परम धर्म माना गया है। दूसरा सत्य है, जिसमें हित-मित-प्रिय वचन बोलने पर बल दिया गया। तीसरा अस्तेय है अर्थात बिना दी हुई वस्तु को ग्रहण न करना। चौथा ब्रह्मचर्य है जो मन और इंद्रियों पर पूर्ण संयम सिखाता है। पांचवां अपरिग्रह है, जिसमें आवश्यकता से अधिक संग्रह न करने और ममत्व त्याग का उपदेश है। इनके साथ अनेकांतवाद का सिद्धांत जुड़ा है, जिसके अनुसार सत्य के अनेक पहलू हो सकते हैं और स्याद्वाद सापेक्ष कथन की शैली है, जो उनके दर्शन का आधार बनी।
उनकी अंतिम वाणी: उत्तराध्ययन सूत्र का दिव्य वचनामृत
कार्तिक कृष्ण अमावस्या को पावापुरी में निर्वाण से पूर्व भगवान ने अंतिम देशना दी। उनके अंतिम उपदेशों का सार यह है कि ‘अप्पा सो परमप्पा’, यानी आत्मा ही परमात्मा है, इसलिए बाह्य आडंबर छोड़कर स्वयं को जानना चाहिए। उन्होंने कहा कि ‘जो इरियावहियं सूत्रं’, अर्थात चलते-फिरते भी जीवों की विराधना न हो, इतनी जागृति रखनी चाहिए। ‘समता भाव’ का उपदेश देते हुए उन्होंने सुख-दुख, लाभ-अलाभ, जीवन-मरण में सम रहने को ही मोक्ष का मार्ग बताया। सबसे करुणामयी संदेश ‘खामेमि सव्वे जीवा’ में दिया, जिसका अर्थ है कि मैं सभी जीवों से क्षमा चाहता हूं और सभी जीव मुझे क्षमा करें। यह क्षमा-भाव ही जैन धर्म का प्राण माना गया है।
दिगंबर जैन समाज के लिए संयम, मोक्ष और दिव्यता का मार्ग
दिगंबर साधु-साध्वी ‘दिग्$अम्बर’ कहलाते हैं, यानी दिशाएं ही जिनके वस्त्र हैं और वे पूर्ण अपरिग्रह व्रत का पालन करते हैं। उनके पास मात्र पिच्छी, कमंडल और शास्त्र होते हैं। भगवान महावीर का जीवन बताता है कि मोक्ष बाहरी क्रियाकांड से नहीं, बल्कि रत्नत्रय यानी सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चारित्र से मिलता है। सच्चा संयम पांच इंद्रिय, मन और कषायों पर नियंत्रण से आता है और पिच्छी इसी अहिंसा-संयम का प्रतीक है, जिससे साधु सूक्ष्म जीवों की रक्षा करते हैं। मोक्ष का मार्ग महाव्रत, समिति, गुप्ति, धर्म, अनुप्रेक्षा, परीषह जय और चारित्र से होकर जाता है। जिनसे कर्मों का क्षय कर आत्मा सिद्ध बनती है। बाहरी त्याग से भी बड़ा अंतरंग त्याग है, जिसमें राग-द्वेष-मोह को छोड़ना होता है। भगवान का संदेश है कि स्वयं से युद्ध करो, दूसरों से नहीं। क्षमा, मैत्री, करुणा और मध्यस्थ भाव ही वास्तविक दिव्यता है।
आज के संदर्भ में संदेश
हिंसा, पर्यावरण संकट और भौतिक दौड़ के युग में महावीर का ‘जियो और जीने दो’ का सिद्धांत सबसे प्रासंगिक है। अपरिग्रह हमें उपभोक्तावाद से बचाता है, अहिंसा हमें शाकाहार और दया की ओर ले जाती है और अनेकांत हमें सहिष्णु बनाता है। गर्भ कल्याणक हमें याद दिलाता है कि महान आत्माएं भी मां के गर्भ से ही आती हैं, अतः नारी, मातृत्व और जीवन का सम्मान परम धर्म है। 19 जुलाई को इंदौर सहित देशभर के दिगंबर जैन मंदिरों में होने वाले अनुष्ठान केवल परंपरा नहीं, बल्कि महावीर की करुणा, संयम और मोक्ष-मार्ग को जीवन में उतारने का संकल्प पर्व हैं।













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