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आचार्य श्री सुनील सागर जी ने कहा पुरातत्व को पुरातत्व रहने दो : जैन तीर्थों का संरक्षण के लिए आचार्य श्री का जैन समाज से आह्वान


आचार्य श्री सुनील सागर जी महाराज ससंघ एवं अंतर्मुखी मुनिश्री पूज्यसागर जी महाराज के परम सानिध्य में त्रिदिवसीय संगोष्ठी में श्री दिगम्बर जैन उदासीन आश्रम ट्रस्ट कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ द्वारा आयोजित कालजयी विरासत, समकालीन विमर्श और स्वर्णिम भविष्य की रूपरेखा” के चतुर्थ सत्र संगोष्ठी के विषय पर गहन मंथन, चिंतन तो हुआ ही साथ ही प्राकृताचार्य श्री सुनील सागर जी ने अपने मंगल आशीर्वचनों में प्राकृत भाषा और जैन धर्म की विशद व्याख्या की। इंदौर से पढ़िए, यह विशेष रिपोर्ट…


इंदौर। आचार्य श्री सुनील सागर जी महाराज ससंघ एवं अंतर्मुखी मुनिश्री पूज्यसागर जी महाराज के परम सानिध्य में त्रिदिवसीय संगोष्ठी में श्री दिगम्बर जैन उदासीन आश्रम ट्रस्ट कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ द्वारा आयोजित कालजयी विरासत, समकालीन विमर्श और स्वर्णिम भविष्य की रूपरेखा” के चतुर्थ सत्र संगोष्ठी के विषय पर गहन मंथन, चिंतन तो हुआ ही साथ ही प्राकृताचार्य श्री सुनील सागर जी ने अपने मंगल आशीर्वचनों में प्राकृत भाषा और जैन धर्म की विशद व्याख्या की।

संगोष्ठी में अंतर्मुखी मुनि पूज्यसागर जी महाराज सहित आचार्य श्री संघ, आर्यिका संघ आदि की उपस्थिति से संगोष्ठी में सारगर्भित चर्चा हुई। आचार्य श्री सुनील सागर जी के परम सानिध्य से उपकृत इस संगोष्ठी में उदयपुर से पधारे डॉ. सुमत कुमार जैन ने प्राकृत में मनोविज्ञान को विभाषित करते हुए कालजयी साक्ष्यों की बात की। दमोह के डॉ. आशीष कुमार जैन बम्होरी, जयपुर से आए आशीष जैन, जबलपुर से आईं रश्मि जैन, जयपुर से बाल ब्रह्मचारी धर्मेद्र जैन भैया ने भी विषय की पड़ताल करते हुए अपने मत-अभिमत से उपस्थित जन समुदाय को अवगत करवाया। कार्यक्रम में अध्यक्षीय उद्बोधन सुरेश जैन ने दिया। इस अवसर पर नईदिल्ली से डॉ. नलिन के शास्त्री, जयपुर से जयकुमार उपाध्ये भी मंचासीन रहकर संगोष्ठी की गरिमा बढ़ा रहे थे। संचालन सरिता जैन ने किया।

जैन दर्शन सबसे प्राचीन, इसकी महत्ता समझें

आचार्य श्री सुनील सागर जी ने संगोष्ठी में अपनी मंगल देशना में कहा कि संस्कृत यदि देव भाषा है तो प्राकृत मातृभाषा है। कुछ कतिपय विद्वानों ने संस्कृत को देव भाषा कहा और प्राकृत को असुर भाषा। उन्होंने कहा कि हमें शिकायत किसी से नहीं है गिरनार जी के संबंध में। हमने कहा था कि पुरातत्व को पुरातत्व रहने दो। उन्होंने गिरनार जी समेत तीर्थों का संरक्षण करने की ठोस पहल करने की बात कही। उन्होंने यह भी कहा कि जैन धर्म और दर्शन सबसे प्राचीन है। इसकी महत्ता को समझा जाए।

संगोष्ठी में इनका हुआ सम्मान

दमोह के डॉ. आशीष कुमार जैन बम्होरी, जयपुर से आए आशीष जैन, जबलपुर से आईं रश्मि जैन, जयपुर से बाल ब्रह्मचारी धर्मेद्र जैन भैया, श्रीफल जैन मीडिया समूह संपादक रेखा संजय जैन का शॉल, श्रीफल और माला भेंट कर सम्मान अमित कासलीवाल, डॉ. अरविंद जैन द्वारा किया गया। साथ ही डॉ. संगीता मेहता के अवतरण दिवस पर उन्हें बधाई और शुभकामनाएं देते हुए उनका भी सम्मान अमित कासलीवाल, डॉ. अरविंद जैन ने किया। डॉ. संगीता मेहता ने आचार्य श्री संघ का अशीर्वाद भी प्राप्त किया। साथ ही समाजसेवी कांतिलाल बम ने भी आचार्य श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया।

इस अवसर पर यह रहे मौजूद

संगोष्ठी में अमित कासलीवाल, डॉ. अरविंद जैन, राकेश जैन विनायका, प्रिंसपाल टोंग्या, राजेन्द्र सोनी, मुकेश बाकलीवाल, अजित जैन, सुमत लुहाड़िया, प्रदीप चौधरी, हसमुख गांधी, इंजी. अनिल कुमार जैन, संगीता मेहता, रेखा–संजय जैन, डीके जैन (रिटायर्ड डीएसपी), बाहुबली पाण्ड्या, कीर्ति पाण्ड्या, दिलीप पाटनी, सुशील पाण्ड्या, रीतेश पाटनी, ऋषभ कुमार जैन, राजेश जैन दद्दू, संजय पापड़ीवाल आदि मौजूद रहे।

 

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