सुरुरपुर में आयोजित श्री मज्जिनेन्द्र पंचकल्याणक महोत्सव के दौरान आचार्य श्री विनिश्चय सागर जी महाराज ने मृत्यु-स्मरण, कर्म सिद्धांत, वैराग्य और आत्मकल्याण पर आधारित प्रेरणादायी प्रवचन दिया। उन्होंने मोह त्यागकर धर्ममार्ग अपनाने का संदेश दिया। पढ़िए श्रीफल साथी मनोज जैन नायक की यह रिपोर्ट।
मुरैना/सुरुरपुर। दिगम्बर संत गणाचार्य विरागसागरजी महाराज के परम प्रभावक आज्ञानुवृती शिष्य वाक्केशरी आचार्य श्री विनिश्चय सागर जी महाराज ने सुरुरपुर में आयोजित श्री मज्जिनेन्द्र पंचकल्याणक महोत्सव के अवसर पर धर्मसभा को संबोधित करते हुए जैन दर्शन के मूल सिद्धांतों पर प्रकाश डाला।
मृत्यु-स्मरण जीवन को बनाता है सार्थक
आचार्य श्री ने कहा कि मनुष्य जीवनभर योजनाएँ बनाता रहता है, लेकिन मृत्यु की निश्चितता को भूल जाता है। यदि हर व्यक्ति को यह स्मरण रहे कि एक दिन उसे भी इस संसार से जाना है, तो वह अनावश्यक संग्रह, लोभ और मोह से स्वयं को दूर रख सकेगा। मृत्यु का स्मरण जीवन को संयमित और सार्थक बनाता है।
कर्म सिद्धांत का समझाया महत्व
प्रवचन में आचार्य श्री ने जैन कर्म सिद्धांत का उल्लेख करते हुए कहा कि आयुष्य कर्म जीवन की अवधि निर्धारित करता है, जबकि वेदनीय कर्म सुख और दुःख का अनुभव कराता है। जीवन में आने वाले कष्ट और परेशानियाँ भी कर्मों के उदय का परिणाम हैं, इसलिए उन्हें धैर्य और समझदारी के साथ सहन करना चाहिए।
संबंध केवल एक जन्म तक सीमित नहीं
आचार्य श्री ने परिवार और संबंधों के वास्तविक स्वरूप को समझाते हुए कहा कि माता, पिता, पुत्र, पत्नी और अन्य रिश्ते केवल वर्तमान जन्म तक सीमित नहीं हैं। अनंत जन्मों में जीव अनेक प्रकार के संबंधों से जुड़ता और अलग होता रहा है। कर्मों के अनुसार संयोग बनते और टूटते रहते हैं, इसलिए अत्यधिक मोह उचित नहीं है।
दुःख के साथ कृतज्ञता का भाव भी जरूरी
उन्होंने कहा कि किसी प्रियजन के संसार छोड़ने पर दुःख होना स्वाभाविक है, लेकिन यह भी समझना चाहिए कि उसने जितने समय तक हमारे साथ जीवन बिताया, उतने समय तक हमारा उपकार किया। इस दृष्टिकोण से देखने पर मोह कम होता है और कृतज्ञता का भाव विकसित होता है।
संतों के जीवन से लेने की प्रेरणा
आचार्य श्री ने कहा कि जो लोग संसार का त्याग कर धर्ममार्ग पर अग्रसर हुए, वे भी कभी सामान्य गृहस्थ थे। उन्होंने जीवन के सत्य को समझा और वैराग्य की राह अपनाई। प्रत्येक व्यक्ति को उनके जीवन से प्रेरणा लेकर धीरे-धीरे मोह कम करने का प्रयास करना चाहिए।
पापों के त्याग का दिया संदेश
प्रवचन के दौरान आचार्य श्री ने हिंसा, असत्य, चोरी, कुशील और परिग्रह जैसे पापों का त्याग करने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि जीवन का उद्देश्य केवल संग्रह करना नहीं, बल्कि आत्मकल्याण और आत्मोन्नति की दिशा में आगे बढ़ना है।
धर्म और वैराग्य ही आत्मकल्याण का मार्ग
आचार्य श्री विनिश्चय सागर जी महाराज ने अपने प्रवचन का समापन करते हुए कहा कि मृत्यु निश्चित है, संबंध अस्थायी हैं और कर्मों का फल अवश्य मिलता है। इसलिए मनुष्य को मोह कम करके धर्म, संयम और वैराग्य की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए, तभी जीवन का वास्तविक कल्याण संभव है।













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