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श्रुत पंचमी ज्ञान और आत्मजागरण का महापर्व : आचार्यश्री निर्भयसागर जी ने श्रुत पंचमी महापर्व का महत्व बताया


आचार्य श्री निर्भयसागर जी महाराज ने छीपीटोला स्थित जैन भवन में श्रुत पंचमी महापर्व की पूर्व बेला पर श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि श्रुत पंचमी जैन समाज का एक अनूठा पर्व है। आगरा से पढ़िए, यह खबर…


आगरा। आचार्य श्री निर्भयसागर जी महाराज ने छीपीटोला स्थित जैन भवन में श्रुत पंचमी महापर्व की पूर्व बेला पर श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि श्रुत पंचमी जैन समाज का एक अनूठा पर्व है। जिसमें खान-पान या भौतिक उत्सव नहीं, बल्कि ज्ञान, स्वाध्याय और आत्मचिंतन को महत्व दिया जाता है। उन्होंने कहा कि ज्ञान आत्मा का गुण स्वभाव और वास्तविक संपत्ति है। ज्ञान के बिना न व्यक्ति को सम्मान प्राप्त होता है और न ही जीवन का समुचित विकास संभव है।आचार्य श्री ने बताया कि ज्येष्ठ शुक्ल पंचमी के दिन आचार्य पुष्पदंत एवं आचार्य भूतबली द्वारा रचित जैन धर्म के महान ग्रंथ षट्खंडागम की रचना पूर्ण हुई थी। इसी अवसर पर पुष्पावली और भूतावली नामक देवियों ने उस ग्रंथ की पूजा-अर्चना की थी, जिसके स्मरण में श्रुत पंचमी पर्व मनाया जाता है।

आहारदान देकर धर्मलाभ अर्जित किया जाता है

उन्होंने कहा कि इस पावन पर्व पर प्रातःकाल सामूहिक णमोकार मंत्र जाप, जिनवाणी माता सरस्वती एवं जिनेंद्र भगवान की पूजा-अर्चना की जाती है। साथ ही गुरुजनों को आहारदान देकर धर्मलाभ अर्जित किया जाता है। सायंकाल जिनवाणी का स्वाध्याय एवं आरती कर ज्ञान के प्रति श्रद्धा व्यक्त की जाती है।

आचार्यश्री को श्रद्धापूर्वक जिनवाणी भेंट की

आचार्य श्री ने जैन धर्म की प्राचीनता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जैन धर्म अनादिकाल से गुरु-शिष्य परंपरा के माध्यम से निरंतर प्रवाहित होता आ रहा है। उन्होंने कहा कि भगवान ऋषभदेव ने मानव समाज को कृषि, शिल्प, वाणिज्य तथा शिक्षा का मार्ग दिखाकर सभ्यता के विकास की आधारशिला रखी। जैन आगम और ग्रंथ प्राकृत भाषा में रचित हैं, जो अत्यंत प्राचीन एवं समृद्ध भाषा मानी जाती है। इस अवसर पर वीवीडी गुरु भक्त परिवार, छीपीटोला द्वारा आचार्यश्री को श्रद्धापूर्वक जिनवाणी भेंट कर उनका मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया गया। श्रद्धालुओं ने श्रुत पंचमी के महत्व को आत्मसात करते हुए ज्ञानार्जन एवं स्वाध्याय को जीवन में अपनाने का संकल्प लिया।

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