जयपुर के चंद्रप्रभ जिनालय, चंद्रपुरी में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के शिष्यों ने विधि-विधान से केशलोचन किया। इस अवसर पर श्रद्धालुओं ने त्याग, तप और अहिंसा की अनूठी साधना का साक्षात दर्शन किया। पढ़िए डॉ. राजेश पंचोलिया, की यह खबर
जयपुर के बड़ के बालाजी स्थित चंद्रप्रभ जिनालय, चंद्रपुरी में इन दिनों आचार्य श्री 108 वर्धमान सागर जी महाराज का विशाल संघ ग्रीष्मकालीन वाचना हेतु विराजमान है। संघ में 10 मुनिराज, 20 आर्यिकाएं, 1 ऐलक, 4 क्षुल्लक-क्षुल्लिकाएं सहित कुल 36 साधु-साध्वियां धर्म प्रभावना में संलग्न हैं।
श्रद्धालुओं के समक्ष हुआ केशलोचन
29 मई को अनेक श्रद्धालुओं की उपस्थिति में आचार्य श्री के शिष्य मुनि श्री ध्येयसागर जी, मुनि श्री भुवनसागर जी, मुनि श्री गुणोदयसागर जी एवं आर्यिका श्री पूर्णिमामति माताजी ने केशलोचन किया। इस आध्यात्मिक साधना को देखकर श्रद्धालु भावविभोर हो उठे।
क्या है केशलोचन का महत्व?
संघ के मुनि श्री हितेंद्रसागर जी ने बताया कि प्रत्येक दिगंबर साधु के लिए दो से चार माह के भीतर केशलोचन करना अनिवार्य होता है। यह केवल बाल हटाने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि राग, मोह और देहाभिमान को त्यागने का आध्यात्मिक अभ्यास है। केशलोचन दिगंबर साधु जीवन का एक मूल गुण माना जाता है।
अहिंसा का जीवंत स्वरूप
मुनि श्री ने बताया कि जैन धर्म अहिंसा प्रधान धर्म है। यदि बालों का लोचन नहीं किया जाए तो उनमें सूक्ष्म जीवों की उत्पत्ति होने की संभावना रहती है। जीवों की रक्षा और अहिंसा के पालन के लिए साधु केशलोचन करते हैं। यही कारण है कि दिगंबर साधु अहिंसा धर्म के महाव्रती कहलाते हैं।
उपवास के साथ निभाई परंपरा
सुरेश सबलावत एवं भागचंद चूड़ीवाल के अनुसार मुनि श्री ने बताया कि जिस दिन केशलोचन किया जाता है, उस दिन साधु उपवास भी रखते हैं। यह तप, त्याग और आत्मसंयम का अद्भुत संगम होता है।













Add Comment