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गिरती वैश्विक अर्थव्यवस्था एवं जैनत्व की अवधारणा: संयम, संतुलन और सहअस्तित्व की ओर लौटने का आह्वान 


आज का विश्व एक विचित्र विरोधाभास के मध्य खड़ा है। विज्ञान अपनी चरम सीमा पर है, तकनीक आकाश को छू रही है, उत्पादन की मशीनें निरंतर गति से चल रही हैं, फिर भी मानवता आर्थिक अस्थिरता, संसाधनों के संकट, बेरोज़गारी, महँगाई और मानसिक अशांति के भंवर में फँसी दिखाई देती है। आज पढ़िए, सुनील सुधाकर शास्त्री का आलेख…


आज का विश्व एक विचित्र विरोधाभास के मध्य खड़ा है। विज्ञान अपनी चरम सीमा पर है, तकनीक आकाश को छू रही है, उत्पादन की मशीनें निरंतर गति से चल रही हैं, फिर भी मानवता आर्थिक अस्थिरता, संसाधनों के संकट, बेरोज़गारी, महँगाई और मानसिक अशांति के भंवर में फँसी दिखाई देती है। विश्व की बड़ी-बड़ी अर्थव्यवस्थाएँ डगमगा रही हैं। कहीं युद्धों का विष है, कहीं बाज़ारवाद का उन्माद, कहीं उपभोग की अंधी दौड़ और कहीं संसाधनों के असमान वितरण की विकराल समस्या। यह केवल आर्थिक संकट नहीं है, यह मनुष्य की चेतना के असंतुलन का संकट है। जब इच्छाएँ आवश्यकताओं से बड़ी हो जाती हैं, तब अर्थव्यवस्था टूटती है। जब संग्रह संवेदना पर भारी पड़ जाता है, तब समाज बिखरता है और जब उपभोग संयम को निगल जाता है, तब प्रकृति प्रतिशोध लेने लगती है। ऐसे संक्रमणकाल में यदि कोई दर्शन मानवता को स्थिरता, संतुलन और सहअस्तित्व का मार्ग दिखाता है, तो वह है-जैनत्व की अवधारणा। जैन दर्शन केवल मोक्ष का मार्ग नहीं, बल्कि जीवन और समाज को संतुलित रखने वाली वैज्ञानिक जीवन-पद्धति भी है। इसमें त्याग है, संयम है, मर्यादा है, मितव्ययिता है, संसाधनों के न्यायपूर्ण उपयोग का संदेश है। आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था जिन सिद्धांतों को खोज रही है, वे सिद्धांत हजारों वर्ष पूर्व जैनाचार्यों ने जीवन में उतार दिए थे।

1.त्याग एवं संयम की अवधारणा: संतुलित उपभोग का शाश्वत विज्ञान

जैनत्व का मूल संदेश है कृ “जितनी आवश्यकता हो, उतना ही ग्रहण करो।”

आज विश्व की अर्थव्यवस्था इसलिए चरमराई है क्योंकि उत्पादन और उपभोग के मध्य संतुलन समाप्त हो गया है। मनुष्य आवश्यकता से अधिक उपभोग कर रहा है। बाज़ार कृत्रिम इच्छाएँ पैदा कर रहा है और उपभोक्ता उन इच्छाओं के पीछे जीवन होम कर रहा है।

जैन जीवन शैली इस उन्मत्त उपभोग संस्कृति के विपरीत संयम का मार्ग प्रस्तुत करती है। सप्ताह के सातों दिनों में अलग-अलग वस्तुओं का त्याग कृ जैसे घी, दूध, दही, तेल, हरी सब्जियाँ, फल, नमक आदि कृ केवल धार्मिक अनुशासन नहीं, बल्कि संसाधनों के संतुलित उपयोग की महान आर्थिक व्यवस्था है।

यदि समाज नियमित रूप से कुछ वस्तुओं का सीमित उपयोग अथवा त्याग करे, तो उत्पादन पर अनावश्यक दबाव कम होगा, वस्तुओं की कृत्रिम कमी नहीं बनेगी और संसाधनों का संरक्षण संभव होगा। यह जीवन पद्धति हमें सिखाती है कि समृद्धि संग्रह में नहीं, संतुलन में है।संयम वह दीपक है जो अर्थव्यवस्था को अंधकार से बाहर निकाल सकता है।

2.अहिंसक जीवन शैली: ऊर्जा संरक्षण और स्वदेशी अर्थनीति

जैनत्व की आत्मा अहिंसा है। यह अहिंसा केवल प्राणी हत्या का निषेध नहीं, बल्कि प्रकृति, संसाधनों और श्रम के प्रति संवेदनशीलता का भी नाम है।

आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा हिंसक उपभोग पर आधारित है कृ अत्यधिक औद्योगिकीकरण, अंधाधुंध परिवहन, प्रदूषण, ईंधन की बर्बादी और मशीनों पर असंतुलित निर्भरता। इसके कारण पेट्रोल, डीज़ल और ऊर्जा संसाधनों का अत्यधिक दोहन हो रहा है।

जैन अहिंसक जीवन शैली हमें स्वदेशी, हस्तनिर्मित और स्थानीय वस्तुओं के उपयोग की प्रेरणा देती है। घर में निर्मित वस्तुएँ, स्थानीय उत्पादन और सरल जीवन न केवल पर्यावरण की रक्षा करते हैं, बल्कि ऊर्जा की भारी बचत भी करते हैं।

जब वस्तुएँ दूर देशों से आयात नहीं होंगी, तब परिवहन पर होने वाला अत्यधिक व्यय घटेगा। करोड़ों गैलन ईंधन की बचत होगी। स्थानीय कारीगरों और लघु उद्योगों को रोजगार मिलेगा। अहिंसक जीवन शैली वस्तुतः एक ऐसी आर्थिक क्रांति है जिसमें प्रकृति भी सुरक्षित रहती है और मानव भी।

3.अनर्थदंड व्रत: संसाधनों के दुरुपयोग का निषेध

जैन धर्म का “अनर्थदंड व्रत” आधुनिक अर्थशास्त्र की दृष्टि से अत्यंत वैज्ञानिक सिद्धांत है। इसका आशय है कृ व्यर्थ और अनावश्यक कार्यों का त्याग।

आज विश्व की आर्थिक समस्याओं का एक बड़ा कारण संसाधनों का दुरुपयोग है। बिना आवश्यकता घूमना-फिरना, अत्यधिक वाहन प्रयोग, बिजली की बर्बादी, वस्तुओं का अनावश्यक उपभोग कृ ये सब अर्थव्यवस्था पर बोझ बनते जा रहे हैं।

अनर्थदण्ड व्रत हमें सिखाता है कि-

व्यर्थ में यात्रा न करें। अनावश्यक बिजली न जलाएँ। वस्तुओं का दुरुपयोग न करें।

सार्वजनिक संसाधनों का सामूहिक उपयोग करें। यदि एक व्यक्ति अकेले वाहन चलाने के स्थान पर सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करे, तो ईंधन, समय और धन कृ तीनों की बचत संभव है। पाँच व्यक्तियों के लिए निर्मित संसाधन केवल एक व्यक्ति के लिए नष्ट न हों कृ यही इस व्रत का व्यावहारिक अर्थ है।

यह व्रत वास्तव में “सस्टेनेबल इकोनॉमी” का भारतीय रूप है, जो कम संसाधनों में अधिक संतुलन का मार्ग दिखाता है।

4.दिग्व्रत एवं देशव्रत रू मर्यादित उपभोग और सीमित विस्तार

आधुनिक मनुष्य की सबसे बड़ी समस्या है- असीमित विस्तार की भूख।

वह निरंतर अधिक दूर, अधिक बड़ा और अधिक महँगा जीवन चाहता है। परिणामस्वरूप विदेश यात्राएँ, विलासिता और अपव्यय बढ़ता जा रहा है।

जैन धर्म का “दिग्व्रत” एवं “देशव्रत” मनुष्य को मर्यादा का पाठ पढ़ाते हैं। इनके अंतर्गत व्यक्ति अपने आने-जाने, उपभोग और विस्तार की सीमाएँ निर्धारित करता है।

आज यदि आर्थिक संकट के समय समाज अनावश्यक विदेश यात्राओं को सीमित करे, स्थानीय पर्यटन और स्वदेशी उपभोग को बढ़ावा दे, तो राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को स्थिरता मिल सकती है। विदेश यात्राओं में व्यय होने वाली अपार धनराशि देश के भीतर रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च की जा सकती है।

मर्यादा ही स्थिरता का दूसरा नाम है। जिस समाज ने अपनी इच्छाओं की सीमाएँ निर्धारित कर लीं, उसे आर्थिक विनाश का भय नहीं रहता।

5.अपरिग्रहवाद रू वैश्विक समानता का आधार

जैन दर्शन का सबसे क्रांतिकारी सिद्धांत है कृ अपरिग्रह।

अर्थात् आवश्यकता से अधिक संग्रह न करना।

आज विश्व में कुछ लोगों के पास अपार संपत्ति है जबकि करोड़ों लोग भोजन, वस्त्र और आवास जैसी मूल आवश्यकताओं से वंचित हैं। यही असमानता अशांति, अपराध, विद्रोह और युद्ध को जन्म देती है।

अपरिग्रहवाद हमें सिखाता है कि-

उतना ही धन रखें जितनी आवश्यकता हो।

अतिरिक्त वस्तुओं को जरूरतमंदों में वितरित करें।

संसाधनों का न्यायपूर्ण वितरण सुनिश्चित करें।

निश्चित वस्त्र, निश्चित धन, निश्चित अनाज और निश्चित संपत्ति की अवधारणा वास्तव में सामाजिक संतुलन की आधारशिला है। जब संसाधन समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचते हैं, तब राष्ट्र में शांति बनी रहती है। जब संग्रह कुछ हाथों में सिमट जाता है, तब क्रांति जन्म लेती है।

अपरिग्रहवाद केवल धार्मिक आदर्श नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक समानता का सर्वाेत्तम सूत्र है।

6.एकासन एवं उपवास व्रत रू आत्मशक्ति और आर्थिक संतुलन

जैन संस्कृति में उपवास और एकासन केवल तपस्या नहीं, बल्कि आत्मसंयम का महोत्सव हैं। सप्ताह में एक दिन अन्न का त्याग अथवा केवल एक समय भोजन करने की परंपरा शरीर, मन और समाज कृ तीनों के लिए कल्याणकारी है।

इससे-

स्वास्थ्य सुधरता है,

आत्मबल बढ़ता है,

अन्न की बचत होती है,

उपभोग नियंत्रित रहता है।

इतिहास साक्षी है कि जब भारत में अन्न संकट उत्पन्न हुआ और विदेशी प्रतिबंधों का सामना करना पड़ा, तब देशवासियों से सप्ताह में एक दिन उपवास रखने का आह्वान किया गया था। यह केवल राष्ट्रीय अनुशासन नहीं था, बल्कि भारतीय संयम संस्कृति की जीवंत अभिव्यक्ति थी।

यदि विश्व आज भी नियंत्रित उपभोग और संतुलित भोजन संस्कृति को अपनाए, तो खाद्य संकट की अनेक समस्याएँ स्वतः समाप्त हो सकती हैं।

वास्तव में जैनत्व की अवधारणा हीभविष्य की अर्थव्यवस्था का प्रकाशस्तंभ है

आज विश्व जिस आर्थिक अंधकार में भटक रहा है, वहाँ जैनत्व का दर्शन दीपस्तंभ की भाँति दिखाई देता है।

यह दर्शन हमें बताता है कि-

समृद्धि उपभोग में नहीं, संयम में है।

विकास संग्रह में नहीं, संतुलन में है।

अर्थव्यवस्था मशीनों से नहीं, मानवीय मर्यादाओं से स्थिर होती है।

त्याग, अहिंसा, अपरिग्रह, मर्यादा और आत्मसंयम कृ ये केवल धार्मिक शब्द नहीं, बल्कि भविष्य की वैश्विक अर्थव्यवस्था के जीवनसूत्र हैं।

यदि मानवता ने जैनत्व की इन अवधारणाओं को जीवन में उतार लिया, तो आर्थिक विषमता, संसाधनों का संकट और सामाजिक अशांति स्वतः कम हो जाएगी।

आज आवश्यकता किसी नई आर्थिक क्रांति की नहीं, बल्कि प्राचीन भारतीय संयम चेतना की पुनर्स्थापना की है।

जैनत्व से परिपूर्ण जीवन शैली हमें यही संदेश देती है कृ

“कम में भी पूर्णता है, संयम में ही समृद्धि है, और त्याग में ही विश्वकल्याण का मार्ग छिपा है।”

आत्म संयम ही हमारे धर्म का आधार है।

भोग में संलिप्त जीवन, जो उसे धिक्कार है।।

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