बड़ के बालाजी श्री चंद्र प्रभ जिनालय में विराजित आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने धर्म उपदेश पाठशाला में अरिहंत, सिद्ध आचार्य परमेष्ठी के गुणों का वर्णन किया। अरिहंत वितरागी सर्वज्ञ और हितोपदेशी है। जिन्होंने कर्म रूपी शत्रु नष्ट किए। जयपुर से पढ़िए, यह खबर…
जयपुर। बड़ के बालाजी श्री चंद्र प्रभ जिनालय में विराजित आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने धर्म उपदेश पाठशाला में अरिहंत, सिद्ध आचार्य परमेष्ठी के गुणों का वर्णन किया। अरिहंत वीतरागी सर्वज्ञ और हितोपदेशी है। जिन्होंने कर्म रूपी शत्रु नष्ट किए। उन्हें अरिहंत परमेष्ठि कहते हैं। सुरेश सबलावत, भागचंद चुड़ीवाल के अनुसार आचार्य श्री ने बताया कि अरिहंत भगवान के 46 मूलगुण में जन्म के 10, केवलज्ञान के 10 और देवकृत 14 कुल 34 अतिशय, 8 प्रातिहार्य तथा 4 अनंत चतुष्टय में अत्यंत सुंदर रूप, सुगंधित शरीर, पसीना नहीं आना, निहार मलमूत्र रहित , हित, मित ,प्रिय वचन कहना, अतुल्य बल ,दूध के समान सफेद खून, 1008 शुभ लक्षण होना आदि जन्म के 10 अतिशयों को समझाया। केवलज्ञान के 10 अतिशय में 100 योजन में सुभिक्ष होना, आकाश में गमन, चतुर्मुख, पूर्ण दया का होना, उपसर्ग नहीं होना, कवलाहार नहीं होना, सब विद्याओं के ईश्वर होना, नख, केश नहीं बढ़ना, आंख की पलकों का नहीं झपकना और शरीर की छाया नहीं पड़ना। देवकृत 14 अतिशय में अर्ध मागधी भाषा, परस्पर मित्रता, दिशाओं ,आकाश का निर्मल होना, सभी 6 ऋतुओं के फल फूल एक समय में फलना दर्पण के समान पृथ्वी का होना, भगवान के चरणों के नीचे 225 स्वर्णमयी कमल की रचना, देवों द्वारा आकाश में जय ध्वनि शीतल मंद सुगंध पवन चलना, सुगंधित जलवृष्टि होना, भूमि कंटक रहित होना, सभी जीवो का आनंद मय होना, धर्म चक्र का आगे-आगे चलना तथा अष्ट मंगल द्रव्य का होना।
इसी प्रकार आठ प्रतिहार्य में अशोक वृक्ष, सिंहासन तीन छत्र, भामण्डल दिव्य ध्वनि पुष्पवृष्टि चमर,और दुंदुभी बाजे चार अनंत चतुष्टय में तप से भगवान चार धातीया कर्मों को नष्ट करने से अनंत दर्शन, ज्ञान , सुख और अनंत वीर्य प्रकट होते हैं।अरिहंत भगवान 18दोषों से रहित होते हैं जिनमें जन्म, बुढ़ापा ,प्यास,भूख,आश्चर्य,आरत,दुख ,खेद शोक,मद, मोह, भय , निद्रा ,चिंता ,स्वेद पसीना ,राग, द्वेष और मरण नहीं होते है।
आठ कर्मों के क्षय से सिद्धों में आठ गुण प्रकट होते हैं
सिद्ध परमेष्ठि जो आठ कर्मों से रहित होते हैं जन्म मरण से हमेशा के लिए छूट गए हैं उन्हें सिद्ध परमेष्ठी कहते हैं उनके आठ मूल गुण होते हैं सम्यक्त्व,अनंत दर्शन, अनंत ज्ञान, अगुरुलघु अवगाहना, सूक्ष्मत्व, अनंतवीर्य अव्याबाध इन आठ कर्मों के क्षय से सिद्धों में ये आठ गुण प्रकट होते हैं। ज्ञानावरणी कर्म के क्षय से अनंत ज्ञान गुण दर्शनावरणी कर्म के क्षय से, अनंत दर्शन गुण वेदनीय कर्म के क्षय सेअव्याबाध गुण, मोहनीय कर्म के क्षय से सम्यक्त्व गुण, आयु कर्म के क्षय से अवगाहन गुण, नाम कर्म के क्षय से सूक्ष्मत्व गूण गोत्र कर्म के क्षय से अगुरु लघु गुण तथा अन्तराय कर्म के क्षय से अनंत वीर्य गुण प्रगट होते हैं आचार्य परमेष्ठी- जो शिक्षा, दीक्षा और प्रायश्चित्त देते हैं, मुनि संघ नायक आचार्य परमेष्ठी होते हैं। इनके 36 मूलगुण होते हैं।निवाई के गुरुभक्त श्रीमती कमलेश सम्मति जैन चांवरिया परिवार की ओर से आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज की भव्य अष्ट द्रव्यों से भक्ति नृत्य के पूजन की गई पूजन के अर्घ्य मंत्र आर्यिका श्री महायश मति माताजी ने उच्चरित किए।













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