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तीर्थंकर बालक जन्म से मति, श्रुत और अवधि ज्ञान के धारी होते हैं : भगवान का जन्म कल्याणक श्रद्धा, भक्ति उत्साह से मनाया गया


संसार समुद्र में दुःख से डूबे हैं, संसार में सुख नहीं है, सुख शाश्वत होना चाहिए और शाश्वत सुख धर्म से मिलता है और धर्म से पुण्य कमाया जाता है और पुण्य से ही सुख के राह मिलती है। यह उद्गार आचार्यश्री वर्धमानसागर जी महाराज ने व्यक्त किए। पदमपुरा से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह खबर…


पदमपुरा। आज आपने तीर्थंकर बालक की देव बालकों के साथ क्रीड़ा देखी है। संसार का हर प्राणी क्रीडा करता है, जो किसी भी रूप में होती है। संसार असार है। इस असार संसार में रहने वाले सुख की कल्पना कर लौकिक सुख चाहते हैं। संसार समुद्र में दुःख से डूबे हैं, संसार में सुख नहीं है, सुख शाश्वत होना चाहिए और शाश्वत सुख धर्म से मिलता है और धर्म से पुण्य कमाया जाता है और पुण्य से ही सुख के राह मिलती है। यह उद्गार आचार्यश्री वर्धमानसागर जी महाराज ने व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि बाल क्रीड़ा में अपने कबड्डी का खेल देखा। संसारी प्राणी भी पुण्य और पाप की कबड्डी में मग्न है। पुण्य प्राप्ति के लिए धर्म की क्रिया करना होगी। पाप हमेशा पुण्य से हारता है पुण्य यदि हारता है तो हमें संसार रूपी समुद्र में दुःख रूपी मगरमच्छ मिलते हैं। ब्रह्मचारी गजू भैय्या ने बताया कि आचार्यश्री ने कहा कि आप संसार में रचे बसे हैं और दुःख में सुख खोज रहे हैं।

देव शास्त्र गुरु संत समागम पुण्य धर्म अर्जित करने के साधन

आचार्य श्री ने बताया कि इंसान से पशु ठीक है क्योंकि, वह दिन भर खाने के बाद भी जुगाली करते हैं। मगर इंसान कभी धर्म रूपी, वैराग्य रूपी, स्वाध्याय रूपी जुगाली नहीं करता। संत आपको अभिषेक, दर्शन, पूजन स्वाध्याय की प्रेरणा देते हैं किंतु, उसमें आपकी रुचि नहीं रहती है। देव शास्त्र गुरु संत समागम पुण्य धर्म अर्जित करने के साधन है। यह रत्नत्रय धर्म के अंग हैं। रत्नत्रय धर्म के अवलंबन से सिद्धालय की राह प्राप्त होती है। पंच कल्याणक से खाली हाथ नहीं जाकर छोटे-छोटे नियम व्रत लेकर प्रतिदिन देव दर्शन, अभिषेक, पूजन, स्वाध्याय, मनन, चिंतन से जीवन में परिवर्तन लाकर मनुष्य जीवन को सार्थक करने का प्रयास करंे। पदमपुरा अतिशय क्षेत्र में श्रीमद जिनेंद्र चौबीसी का पंचकल्याणक प्रतिष्ठा आचार्य श्री वर्धमान सागर जी संघ, आर्यिका सरस्वतीमति, आर्यिका श्री स्वस्तिभूषण माताजी के संघ सानिध्य में मनाया जा रहा है।

शोभायात्रा का समापन पाण्डुक शिला पर हुआ

गुरुवार को विधिनायक आदिनाथ तीर्थंकर बालक का जन्म हुआ। इसका नाटकीय मंचन सुमधुर स्वर लहरियों में सभी ने मंत्रमुग्ध होकर देखा, सुना। भक्ति से नृत्य कर इंद्रों के साथ सभी ने खुशियां मनाई। शोभायात्रा का समापन पाण्डुक शिला पर हुआ। भगवान को विराजित कर सबसे पहले तीर्थंकर बालक का अभिषेक सौधर्म इंद्र सुरेंद्र शची इंद्राणी मृदुला ने किया। इनके बाद बोली के माध्यम से चयनित राजेश बी शाह अहमदाबाद और अन्य सौभाग्यशाली परिवारों ने किया। सभी इंद्रों के अभिषेक के बाद समाजजनों ने अभिषेक किया। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के चरण प्रक्षालन कर जिनवाणी भेंट मुनि श्री प्रभव सागरजी, तारा,राजेश, राकेश सेठी जयपुर कोलकाता परिवार ने किया। संयोग से संघस्थ शिष्य मुनि श्री प्रभव सागर जी का भी जन्म एवं दीक्षा दिवस है। इसके पूर्व चित्र अनावरण एवं दीप प्रज्वलन संतोष सेठी, चिरंजीलाल बगड़ा कोलकाता ने किया। कर्नाटक मठ बद्री के भट्टारक भी विशेष रूप से उपस्थित रहे।

तीर्थकर प्रभु का जन्म सौधर्म इंद्र का आसन कंपायमान 

9 माह पूर्ण होने पर तीर्थकर बालक का जन्म होता है। जन्म होते ही तीन लोक के प्राणियों को पल भर के लिए शांति का अनुभव होता है। देवताओं द्वारा 12.30 करोड़ प्रकार के बाजे बजाए जाते हैं। सौधर्म इंद्र का आसन कंपायमान होता है और ध्यान लगाकर सौधर्म इंद्र यह जानते हैं कि अमुक नगरी में तीर्थंकर बालक का जन्म हुआ है। वह अपने सिंहासन से खड़े होकर सात कदम आगे चलकर स्वर्ग से तीर्थकर बालक को नमस्कार करता है। सौधर्म इंद्र सभी देव परिवार के साथ ऐरावत हाथी पर शचि इंद्राणी के साथ तीर्थकर बालक की जन्म नगरी की ओर प्रस्थान करता है।

तीन परिक्रमा कर शचि इंद्राणी ने किए प्रभु के दर्शन 

सौधर्म इंद्र ऐरावत हाथी पर शचि इंद्राणी के साथ सवार होकर तीर्थंकर बालक का जन्म जिस नगरी में हुआ है। उस नगर के तीन परिक्रमा लगाते हैं और शचि इंद्राणी प्रसुति गृह में जाती है, जहां तीर्थकर माता के पास मायावी बालक को सुलाकर तीर्थंकर बालक को अपनी गोद में लेकर बाहर आती है। तीर्थकर बालक के दिव्य मनोहर अलौकिक रूप को देखकर शचि इंद्राणी अत्यंत भाव विभोर होकर परिणाम में विशुद्धि बढ़ जाती है और संसार को केवल दो भव प्रमाण कर लेती है। वर्तमान भव सहित अर्थात तीर्थंकर बालक का दर्शन कितना पुण्यशाली होता है कि शचि इंद्राणी रानी एक भव अवतारी हो जाती है। तीर्थकर बालक को सौधर्म इंद्र जब गोद में लेता है तो दो नेत्रों से उन्हें संतुष्टि नहीं मिलती तो वह अपने 1000 नेत्र लगाकर भगवान को निहारते हैं। तीर्थकर बालक को देखते हैं। इसके बाद सौधर्म इंद्र शचि इंद्राणी के साथ ऐरावत हाथी पर तीर्थंकर बालक को लेकर जाते हैं। रत्न सिहासन पर विराजमान कर क्षीरसागर से 1008 जल के घडो कलशौ से भगवान का जन्म अभिषेक वैभव के साथ करते हैं। बालक के दाहिने पैर पर जो चिन्ह होता है। वही तीर्थकर का लांछन होता है। तीर्थंकर बालक के जन्म अभिषेक के बाद सौधर्म इंद्र तीर्थकर बालक का नामकरण करते हैं।

 8 वर्ष की उम्र में अणुवर्ती

8 वर्ष की आयु में तीर्थकर बालक अणुव्रत का पालन करने लग जाते हैं। क्रम से युवावस्था प्राप्त कर कुछ तीर्थकरों का विवाह भी होता है तीर्थकर कुमार माता पिता के इकलौते हैं। उनका राज्याभिषेक किया जाता है। संयोग पाकर वैराग्य का निमित्त मिलता है और वह वन की ओर प्रस्थान करते हैं। तीर्थकर स्वयंभू होते हैं अन्य किसी के संबोधन की आवश्यकता नहीं होती है। केवल सामान्य निमित्त पाकर वह वैराग्य को प्राप्त करते हैं। तीर्थंकर सम्मेद दृष्टि होते हैं तत्वों का यथार्थ चिंतन करते हैं।

तीर्थकर बालक माता पिता की इकलौती संतान

तीर्थकर बालक अपने माता-पिता की इकलौती संतान होते हैं। तीर्थकर बालक के जन्म होने के बाद माता-पिता को अन्य कोई संतान नहीं होती है। तीर्थकर बालक के भोजन भोग उपयोग की सामग्री स्वर्ग से सोधर्म इंद्र भेजते हैं। तीर्थकर बालक के साथ बाल क्रीड़ा जो होती है वह स्वर्ग के देव आकर करते हैं।

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