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जहां सारे भेष विसर्जित हो जाते हैं वहां दिगंबर भेष जन्म लेता है : आचार्य श्री विमर्श सागर जी के सानिध्य में आचार्य श्री विरागसागर जी का मनाया 43 वां दीक्षा दिवस 


आचार्य श्री विराग सागर जी का 43 वां मुनि दीक्षा दिवस बुढ़ाना धर्मनगर में मनाया गया। आचार्य श्री विमर्शसागर जी महाराज ससंघ (35 पिच्छी) के सानिध्य में बुढ़ाना शहर के कृष्णा पैलेस में हुआ ‘विराग महोत्सव’ मनाया गया। बुढ़ाना (उप्र) से पढ़िए, सोनल जैन की यह खबर…


बुढ़ाना (उप्र)। आचार्य श्री विराग सागर जी का 43 वां मुनि दीक्षा दिवस बुढ़ाना धर्मनगर में मनाया गया। आचार्य श्री विमर्शसागर जी महाराज ससंघ (35 पिच्छी) के सानिध्य में बुढ़ाना शहर के कृष्णा पैलेस में हुआ ‘विराग महोत्सव’ मनाया गया। मंगलवार को संपूर्ण भारत वर्ष में आचार्य श्री विरागसागर जी महामुनिराज का 43 वां मुनि दीक्षा दिवस हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। आचार्य गुरुवर के 500-550 शिष्य प्रशिष्यों ने धर्म समाजों के मध्य गुरुवर का संयमोत्सव मनाया। बुढ़ाना धर्मनगर में आयोजित गुरुवर के 43 वें महामुनि दीक्षा दिवस पर भक्तों और शिष्यों की विनयांजलि के उपरांत आचार्य श्री विमर्शसागर जी ने अपने गुरुवर आचार्य श्री विरामसागर जी के चरणों में भाव विनयांजलि समर्पित करते हुए कहा कि यह पावन पवित्र जिनमुद्रा मात्र इस धरती पर ही मान्य नहीं है अपित यह जिनमुद्रा संपूर्ण तीनों लोकों में वंदनीय,अर्थनीय, पूजनीय है। आज वह श्रेष्ठ दिवस है।

9  दिसम्बर 1983 को मुनि मुद्रा को धारण किया

जब इस युवा के महान संत आचार्य विरागसागर जी महामुनिराज ने 9  दिसम्बर 1983 को महाराष्ट्र प्रांत के औरंगाबाद धर्मनगरी में जिनेन्द्र भगवान द्वारा प्रतिपादित सर्वश्रेष्ठ मुनि मुद्रा को धारण किया था। हमारे आचार्य गुरुदेव अत्यंत सरल स्वभावी थे। वे जहां से गुजर जाते थे वहीं से अनेकों युवा साथी सांसारिक भोग-विलासों को ठुकराकर वैराग्य पथ को अंगीकार कर लिया करते थे।

भक्ति युक्त भाव विनयांजलि समर्पित

आचार्य श्री ने प्रवचनों में कहा- बन्धुओं ! दिगम्बर भेष इस धरा पर अलौकिक हुआ करता है, जहां अन्य कोई वेशभूषा नहीं ओढ़ी जाती। अपितु जहां सारे भेष विसर्जित हो जाते हैं, वहां दिगम्बर भेष जन्म लेता है। आचार्य गुरुवर की साधना का माहात्म्य बताते हुए आचार्य श्री विमर्शसागर जी ने कहा कि साधक ने अपने पूरे जीवन काल में कैसी उत्कृष्ट साधना की है। यह उसका अंतिम समय बताता है। आचार्य श्री ने अपनी साधना का फल उत्कृष्ट समाधि के रूप में हमारे बीच प्रस्तुत किया। बंधुओं आचार्य गुरुवर जैसी सर्वश्रेष्ठ समाधि दूर-दूर तक भी नहीं देखी जाती है। आज के शुभ दिवस पर हम सभी गुरुवर के चरणों में भक्ति युक्त भाव विनयांजलि समर्पित करते हैं।

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