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भाव पूर्वक किए नमोस्तु से जीवन के दुःख होते हैं समाप्त : मुनि श्री हितेन्द्र सागर जी ने प्रवचन में बताया बच्चों में संस्कार जरूरी है


आचार्य श्री वर्धमान सागर जी संघ सहित श्याम नगर जयपुर में विराजित हैं। तीन दिवसीय स्वयंभू विधान का समापन शुक्रवार को हुआ। धर्मसभा में मुनि श्री हितेंद्रसागर जी ने पुण्य, संस्कार और नमोस्तु का महत्व बताया। जयपुर से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह खबर…


जयपुर। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी संघ सहित श्याम नगर जयपुर में विराजित हैं। तीन दिवसीय स्वयंभू विधान का समापन शुक्रवार को हुआ। धर्मसभा में मुनि श्री हितेंद्रसागर जी ने पुण्य, संस्कार और नमोस्तु का महत्व बताया। राजा सिद्धार्थ पहले भी थे, लेकिन उन्हें सीमित लोग ही जानते थे परन्तु, जिस दिन उनके घर वर्धमान महावीर का जन्म हुआ। उसी दिन से तीनों लोकों में सिद्धार्थ की पूजा होने लगी। पुण्यवान संतान के कारण पिता भी पूज्य बन जाता है। इसलिए जीवन में सबसे जरूरी है पुण्य का संचय। बच्चों में संस्कार क्यों जरूरी हैं? आज के बच्चे मंदिर और धर्म से दूर हो रहे हैं। कारण, उन्हें बचपन से गुरुओं और मंदिर से नहीं जोड़ा जाता। मिथ्यात्व (गलत दृष्टि) के साथ जन्म लेते हैं। सुरेश सबलावत के अनुसार मुनि श्री ने कहा किबच्चों को बार-बार मंदिर लाओ, गुरु के पास बैठाओ, सही वातावरण दो वैसे ही सही जगह ले जाना माता-पिता की जिम्मेदारी है।

बच्चों को धर्म से जोड़ो, वही भविष्य बनाता है 

अक्षय तृतीया और नमोस्तु का महत्व प्रतिपादित कर मुनि श्री ने बताया कि अक्षय तृतीया का दिन अत्यंत पुण्यदायक है। भगवान आदिनाथ को 12 महीने से अधिक के बाद आहार मिला और पहली बार “नमोस्तु” का उच्चारण हुआ। वह नमोस्तु अक्षय (कभी समाप्त न होने वाला) बन गया।इस दिन किया गया नमोस्तु भी अक्षय हो जाता है भावपूर्वक किया गया। नमोस्तु जीवन के दःुख मिटा सकता है सच्चा नमोस्तु कैसे करें। इसकी सरल भाषा में विवेचना कर बताया कि नमोस्तु केवल शब्द नहीं है, यह भाव है। आवश्यक है, मन, वचन और काया की एकाग्रता पूर्ण श्रद्धा और समर्पण। यदि एक बार भी सच्चे भाव से नमोस्तु हो जाए तो जीवन के अनेक दःुख समाप्त हो सकते हैं। अंतिम संदेश पुण्य कमाओ, वही जीवन को ऊँचा उठाता है। बच्चों को धर्म से जोड़ो, वही भविष्य बनाता है नमोस्तु को भाव से करो, वही जीवन बदल देता है सिर्फ मेहनत से नहीं, सही भाव से जीवन सफल होता है।

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